Tuesday, 8 September 2015

कन्या सशक्तीकरण का सवाल कठघरे में --कुलीना कुमारी

कन्या सशक्तिकरण मतलब कन्या या बालिका की मजबूती और उसके विकास के लिए किया जाने वाला तमाम प्रयास। इस हेतु राष्ट्रीय व राज्यीय स्तर पर योजनाएं भी कई है और प्रावधान भी कई मगर आज भी भारतीय परिदृश्य में कन्याओं या बालिकाओं की दुर्दशा हमें बता रही है कि इसका बहुत लाभ बच्चियों को नहीं मिल पा रहा है। पुरूषवादी नीति, महिलाओं के प्रति दुर्भावना और उसे दोयम दर्जे का माने जाने वाला भाव जैसे नकारात्मक माहौल का शिकार आज भी बड़ी संख्या में लड़कियां है।

2011 की जनगणना के अनुसार, 1000 लड़कों की तुलना में मात्र 940 लड़कियां है, यद्यपि यह 2001 की तुलना में 7 अधिक है। मगर लड़कों से कम लड़कियांें की संख्या हमें बताती है कि अभी भी लड़कियों के लिए माहौल अच्छा नहीं। कन्या भ्रूण हत्या प्रतिबंधित किए जाने के बाद भी इसका चालू रहना या फिर विभिन्न तरीकों के माध्यम से लड़की बच्चों के प्रति समाज में जारी अरूचि का यह संकेत है।

शिक्षा के स्तर में भी बालिका और बालक के बीच बड़ा गैप है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार, भारत के प्रायमरी और सेकेंडरी एजुकेशन के पब्लिक और प्रायवेट स्कूली मापन के हिसाब से इसका अनुपात 2011 में 98.40 था। यह आंकड़ा बताता है कि आज भी शैक्षिक स्तर पर एक ही घर में कैसे लड़का-लड़की में भेद किया जाता होगा या किया जाता है, तभी तो इन दोनों के अनुपात में इतना बड़ा फर्क है या लड़कियों की स्थिति लड़कों की तुलना में इतना कमतर है।

प्रायः यह भी देखा गया है कि अभिभावक बेटा बच्चा को प्रायवेट स्कूल में भेज देते हैं मगर बेटी को सरकारी में क्योंकि सरकारी स्कूल में एक प्रकार की मुफ्त शिक्षा मिलती है जबकि प्रायवेट स्कूल मंहगी। बेटी के लिए क्यों पैसे खर्च करें। ऐसे कितने ही परिवार पाए जाते हैं और जिन्हें बेटा’-बेटी दोनों है, उनका लड़का प्रायवेट स्कूल में पढता है बल्कि बेटी सरकारी स्कूल में। वैसे सरकारी स्कूल मे किताबें व ड्रेस तथा पढ़ाई के खर्चे के लिए विद्यार्थी को कुछ सहयोग राशि भी मिलता है, और लंच भी। मगर इसके बावजूद भी समय-समय पर सरकारी स्कूल के शैक्षिक गुणवŸाा पर प्रश्नचिन्ह लगाया जाता रहता है। कैसे लगाया भी ना जाए, शिक्षक बच्चे का अनुपात बहुत कम और भवन, शौचालय और साफ-सफाई की व्यवस्था भी ठीक नहीं पाई जाती, उसकी सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है। विशेषकर ग्रामीण इलाकों में तो और बुरा हाल है। बहुत सारे स्कूल ऐसे पाए जाते हैं, जिसे बाऊंड्री बॉल से घेरा नहीं जाता और सिक्यूरिटी गार्ड की व्यवस्था नहीं रहती। इसीलिए सरकारी स्कूल में भी लड़की की सुरक्षा संशय में रहती है और वहां से बच्चे चोरी की घटनाएं भी सुनने को आती रहती है। सरकारी स्कूल के इस अव्यवस्था से कुछ बड़े नुकसान, एक तो सुरक्षा में प्रश्न चिन्ह लगने से अभिभावक बेटियों को स्कूल नहीं भेजना चाहेंगे या कम भेजेंगे, दूसरा अव्यवस्था से शिक्षण प्रक्रिया को ग्रहण करने में व पठन-पाठन को बेहतर तरीके से समझने में दिक्कत होगी क्योंकि परेशानियां नई चीजें को ग्रहण करने में व उसके प्रति रूचि पैदा करने में कठिनाइयां लाती है। तीसरा, शिक्षक के कम होने से व पूरा अध्ययन अध्यापन ठीक तरीके से नहीं कराए जाने से लड़की बच्चों के प्रतियोगिता में बेहतर कर दिखाने मंे दिक्कत होगी। वैसे जहां भी लड़कियों को मौका मिला है, उसने बेहतर परफॉरमेंस करके दिखाया है, शिक्षा व यूपीएस सी जैसे परिक्षा में टॉप कर वह दिखा चुकी है कि उसे मौका मिले तो सबसे आगे आ सकती है मगर इसके लिए मौका और लड़कियों के लिए बेहतर माहौल जरूरी है। मोदी द्वारा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की योजना का आरंभ बालिका सशक्तिकरण के उद्देश्य से किया गया है मगर इसका कितना लाभ मिला, यह तो भविष्य ही बताएगा। वैसे सिंगल लड़की के लिए भी कई सुविधाएं सरकार के तरफ से दी जाती है। शिक्षा लोन व विवाह के लिए भी कुछ राहत राशि संबंधी भी योजनाएं चल रही है। बालिका सशक्तिकरण के उद्देश्य से  प्रधानमंत्री द्वारा ‘कन्या समृद्धि योजना’ का भी शुभारंभ किया गया है। इसमें रेट ऑफ इंटेरेस्ट अधिक मिलते हैं। मगर प्रश्न तो यह भी है कि जिस अभिभावक के पास वह न्यूनतम एमाउंट जमा करने की भी क्षमता नहीं, उन लड़कियों को इसका लाभ कैसे मिलेगा। और कोई भी योजना, जब इसकी जानकारी ना हो तो इसका लाभ कैसे लिया जा सकता है। अभी भी ग्रामीण इलाके में अशिक्षा, अंधविश्वास और महिलाओं को दोयम दर्जें की माने जाने वाली कुरीतियां हावी है और बहुत से गांवों में बिजली और कम्प्यूटर की सुविधा सरल नहीं तो कैसे इसका लाभ लड़की को मिले। योजनाएं चल रही है मगर इन कमियों की वजह से सभी लड़कियों तक यह नहीं पहुंच पा रही है। बालिका सशक्तिकरण की राह आसान नहीं।

वैसे  स्वास्थ्य के स्तर पर राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम चलते हैं और किशोर स्वास्थ्य संबंधी योजनाएं भी। मगर एक आंकड़े के अनुसार, विश्व की 30 प्रतिशत बच्चे कुपोषित अगर भारत में पाए जाते हैं तो भारतीय बच्चों के स्वास्थ्य का स्तर आराम से लगाया जा सकता है।

ऐसे ही चाइल्ड लेबर भी एक बड़ी समस्या है। 2011 के जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, 5-14 साल के बच्चे जो कार्यरत है, उनकी संख्या 43.53 लाख पाई गई। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में भारत, चाइल्ड लेबर के रूप में सबसे बड़ा बल है। यह आंकड़े कामकाजी बच्चों की स्थिति के साथ बहुत छोटी उमर में ही कैसे उसे झमेले में धकेला जा रहा है, उसका प्रमाण है। सरकारी तंत्र और प्रशासन मौन के रूप में अपना रोल जैसे निभा रहे हैं। रेलवे स्टेशन, रेड लाइट और अब मेट्रो स्टेशन पर भी बच्चों को भीख मांगते या विभिन्न प्रकार के सामान बेचते देखा जा सकता है। अगर इसपे नियंत्रण की मंशा होती सरकार और कानून व्यवस्था की तो ऐसा हाल नहीं होता। प्रश्न तो चाइल्ड लेबर को पकड़कर रखे जाने और उसकी शिक्षा और विकास के लिए कार्यरत तथाकथित एनजीओ पर भी है, जिन बच्चों को पकड़कर बच्चों के आश्रय स्थल में रखा जाता है, वहां भी बच्चों की स्थिति प्रायः अच्छी नहीं पायी जाती। बच्चों के लिए कार्यरत कुछ एनजीओ में ही बच्चों पर जुल्म करते हुए देखा गया और एक सर्वेक्षण के दौरान पाया कि वहां बच्चों से खाना बनवाया जा रहा था और विभिन्न तरह के कार्य करवाए जा रहे थे। रिपोर्ट से यह भी पता चला कि कितने ही बच्चे मौका मिलते ही भाग जाते हैं। ऐसा क्यों होता है, सोचना मुश्किल नहीं।

बच्चों की सुरक्षा और व्यापार भी एक बड़ी समस्या है। 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुमानतः 135,000 बच्चे हर साल ट्रैफिक्रिग के शिकार होते हैं। ये बच्चे बंधुआ मजदूर, घरेलू नौकर, भीख मांगने या फिर सेक्सुअली कार्य के लिए रेड लाइट एरिया में बेच दिए जाते हैं।
ऐसे ही लड़कियों की सुरक्षा को लेकर भी सोचनीय स्थिति है।  यूनिसेफ द्वारा किए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 15-19 साल की 5 प्रतिशत भारतीय लड़कियां यौन हिंसा की पीड़ित पाई गई।
ऐसे ही बाल विवाह भी भारत मंे जारी जबकि यहां भी कानूनी रूप से प्रतिबंधित है । एक आंकड़े के अुनसार, विश्व में होने वाले तमाम बाल ,विवाह में से 40 प्रतिशत भारत में होते है। राजस्थान, आंध्र प्रदेश, बिहार, उŸार प्रदेश और मध्य प्रदेश आदि बाल विवाह में आगे है।

मगर कन्या सशक्तिकरण के लिए सफर यही तक नहीं और कठिनाइयां भी कम नहीं। इन तमाम दिक्कतों के अलावा लड़की का शादी के बाद दूसरे घर जाना, और लड़की की इज्जत बनाम सुरक्षा का प्रश्न घरेलू और सामाजिक स्तर पर हावी है। पराया धन कहे जाने से मां-बाप भी उसे जैसे पराया ही समझ लेते हैं और शायद अधिकतर घरों में लड़की के लिए उतना ही शिक्षा, विकास और अधिकार जरूरी समझा जाता है, जितना शादी के लिए जरूरी है। वही बेटा बच्चा को अपना समझा जाता है और उसके विस्तार और विकास की असीमित कोशिश की जाती है। फिर लड़की के लिए सुरक्षा का प्रश्न उसके दायरे सीमित कर देते हैं और उसे रेप और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं से बचाने की भावना प्रबल हो जाती है। वैसे उसके दायरे इसलिए भी सीमित कर दिए जाते हैं  और उसे मां-बाप या समाज के द्वारा ही गुलाम बनाए रखने की मंशा कायम रहती है ताकि ससुराल में बिटिया बस सकें और वहां से लड़ झगड़कर या उनका जुल्म सहने से मना कर वापस ना आए। क्योंकि समाज
पुरूषवादी तो महिला को हिस्सा और हक ना मायके वाले को देने की मंशा हुई है और ना ही ससुराल वालों की।

अतः घरेलू, सामाजिक और कानूनी जब तीनों प्रकार की स्थितियां लड़कियों के अनुकूल होगी, तभी  कन्या सशक्तिकरण के रास्ते अधिक तेजी से खुल पाएंगे। यद्यपि जागरूकता आई है और पहले से बेहतर स्थिति भी लड़कियों के लिए हुई है। कन्या सशक्तिकरण योजना व सरकारी सुविधा ने महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार आसानी से खोले हैं और लड़की के लिए लाभ की योजना ने मां-बाप को लड़की को आगे कर उसका लाभ उठाना सिखा रहा है और अवसर मिलने पर लड़कियां खुद को साबित भी कर रही है मगर योजनाआंे का लाभ तक ही अगर बेटी को आगे बढ़ाया जाए तो निश्चित ही अब भी लड़कियों की राहंे दुर्गम है, और इनसे आगे निकलने के रास्ते अभी और तलाशने होंगे। इसके लिए सरकारी नीतियों के साथ-साथ घरेलू और समाजिक नियमांे की पुनः समीक्षा और लड़कियों के प्रति दोयम दर्जे वाला भाव दूर करने हेतु अभी और पहल करने की जरूरत है।

Thursday, 3 September 2015

महिला स्वतंत्रता के मायने -कुलीना कुमारी

भारत अपना 69वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है, ये बहुत खुशी और गौरव की बात है कि हम आजाद देश के वासी अब कहलाते हैं मगर क्या इस आजाद देश में महिलाएं भी आजाद है, उसे भी स्वतंत्रता मिली है क्या? इस सवाल की पड़ताल करना ना केवल किसी बुद्धिजीवी व विचारक के लिए जरूरी है बल्कि देश की आधी आबादी महिला की होने की वजह से भी आवश्यक है।

यद्यपि मुट्ठी भर महिलाओं की स्थिति अच्छी दिख रही है और विभिन्न क्षेत्रों में वे अपने को स्थापित भी करते दिख रही है मगर अधिकतर महिलाओं की स्थिति चिंताजनक है। बहुसंख्य महिलाओं की गुलाम और पुरूषों की तुलना में कमतर स्थिति देखते हुए कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता दिवस का मतलब पुरूषों के लिए ही है, बहुसंख्य महिला के लिए इसका जश्न मनाने का समय अभी नहीं आया है।

वैसे जब बात चल रही है स्वतंत्रता की तो क्यों न इसका अर्थ समझ लिया जाए। सैद्धांतिक रूप से स्वतंत्रता के जो भी मायने हो मगर व्यवहारिक रूप से स्वतंत्रता का मतलब अपने मन से खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने की आजादी के साथ-साथ अपने पसंद का साथी चुनने का अधिकार शामिल है, इसमें अपने मन से जीवन जीने का तरीका के साथ-साथ अपने विकास व खुशी के लिए नौकरी व अन्य सुविधाएं चुनने का अधिकार और अपने को अभिव्यक्त करने का हक जैसी तमाम बातें शामिल मानी जा सकती है। ये सब चीजें पुरूष आसानी से प्राप्त कर लेते हैं मगर महिला को इस सब मामले में पुरूष का पिछलग्गु बना दिया है और उसके लिए वही अधिकार उपयुक्त समझा गया है जिसमें पुरूष सदस्य का मुहर लग जाए। गिनी-चुनी महिलाओं को ही ये परमिशन मिल पाता है या वे ले पाती है व उन्हें अपने मन से काम करने की या समाज के बीच उठने-बैठने की आजादी देखी जाती है।
अधिकतर महिला आज भी दोयम दर्जे का जीवन जीते देखी जा रही है। महिला के लिए घर की चारदीवारी ही सबसे सुंदर व सुरक्षित क्षेत्र मानी गई है, इसके अंदर वो चाहे तो कुछ भी कर लें, बाहरी कार्यों के लिए पुरूष की परमिशन और उसका या किसी का साथ जरूरी माना जाता है जैसे वह व्यक्ति ना होकर एक वस्तु हो, जिसे अकेले जाने पर कोई लेकर उसे उड़ जाएगा। यद्यपि कभी कभार अनहोनियां भी होती है मगर वो तो किसी के साथ भी हो सकती है। ठीक है, छेड़छाड़ या रेप की घटनाएं महिलाओं के साथ ही होती है या हो सकती है, मगर इससे तो डटकर लड़ा जा सकता है, अगर कोई इसकी शिकार हो भी जाए तो क्या यह आजादी से बड़ी तो नहीं जो इससे डरकर घर में बंद रहना या गुलाम रहना स्वीकारा जाय, गलत है यह। जो इज्जत के नाम पर महिलाओं को गुलाम बनाए रखने की यह हथकंडा अपनाते हैं, विशेषकर उनसे बताना चाहती हूं कि इस इज्जत का मखौल व उपयोग या दुरूपयोग सबसे ज्यादा घरवाले व महिला के जानने वाले ही करते हैं, रेप के आंकड़े बताते हैं कि 4 में से 3 रेप के आरोपी तो महिला के परिजन या पहचान के लोग ही पाए जाते हैं, फिर भी महिला को क्यों इसका डर दिखाया जाता है और दबाकर रखने की कोशिश की क्यों की जाती है? वजह साफ है, किसी न किसी वजह से पुरूषवादी सŸाा द्वारा उसे वश में रखने का प्रयास किया जाता है और इसमें पुरूषवादी समाज काफी हद तक सफल भी है। महिला को बंद करके रखने की बड़ी वजह यह हो सकती है कि पुरूषवादी समाज डरता है कि उसके काले कारनामे महिला उजागर ना कर दे और फिर उसका रीति-रीवाज या धर्म के नाम पर उसका उल्लू सीधा करने में दिक्कत ना हो जाए। शायद इसलिए वह महिला पर पाबंदियां लगाता है कि बाहर-भीतर करने से कही महिला जागरूक और अपने अधिकार के प्रति प्रतिबद्ध ना हो जाए और फिर उसकी जुल्म और गुलामी मानने से इंकार ना कर दें, इसीलिए पुरूषवादी समाज महिला को महिला को बंद करके रखना चाहता है, मगर सवाल यह भी है कि महिला ही क्यों ये सारी वंदिशें सहती है? वे कौन सी वजह है, जिस कारण आज भी महिला गुलामी में जीने के लिए अभिशप्त है? क्या महिला इतनी कमजोर है कि वह आजाद हो ही नहीं सकती, ऐसे कौन से जकड़न और मानसिकता है जो महिला को आज भी गुलाम रहने के लिए मजबूर करती है? अथवा वे कौन कारक है जो महिलाओं के विकास में अवरोधक है और उसके सशक्तिकरण के राह में बाधक बने हैं। ऐसे तमाम सवाल है, जिसकी पड़ताल किया जाना जरूरी है। इसी परिप्रेक्ष्य पर एक नजर.. वैसे तो महिलाओं की गुलामी की कई सारी वजह हो सकते हैं मगर मेरे ख्याल से इसके कुछ प्रमुख वजह है, जिसकी वजह से आज भी महिला गुलामी में जीने के लिए अभिशप्त है?

पहचान का अभाव

आज भी हमारे समाज में बेटी का जन्म खुशी की बात नहीं मानी जाती और इसके अतिरिक्त उसकी पहचान के लिए भी कोई प्रयास नहीं किया जाता, लड़की किसी की बेटी, बहन, पत्नी या मां होती है। शायद लोगों को यह मजाक लगता हो मगर अधिकतर लोग जानते हैं कि विशेषकर ससुराल में उसे अपने पति की पत्नी या बच्चे की मां के रूप में ही संबोधित किया जाता है। जब उसकी पहचान ही नहीं तो आजादी किस बात की, जिसकी पहचान होती है, उसे अपनी आजादी लेना भी आ जाता है मगर बचपन से ही अपने पहचान के प्रति प्रोत्साहित करने वाले बहुत कम खुशनसीब बेटियां पाई जाती है और ऐसे ही खुशनसीब बेटियां अपनी गुणात्मक शिक्षा, बुद्धिमानी से आजाद व सुंदर जीवन जी पा रही है।

अशिक्षा, अव्यवहारिक शिक्षा और दोषपूर्ण परवरिश
शिक्षा की कमी, पुरूष पर निर्भरता और महिला में आत्मबल का अभाव भी उसे गुलाम जीवन जीने के लिए मजबूर करता है। ना केवल इतना बल्कि एक बहुत जरूरी और नोट करने वाली बात यह भी है कि क्यों शिक्षित महिला भी जिसने उच्च शिक्षा भी प्राप्त कर रखी है, क्यों गुलाम होकर जीवन जी रही है, इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उसने शिक्षा तो प्राप्त की है, मगर शिक्षा प्राप्त की है सिर्फ किताबी, उसे जीवन की व्यवहारिकता का ज्ञान नहीं है और जब इसका ज्ञान नहीं है तो निश्चित ही वह पढ़ लिखकर भी एक प्रकार का मूर्ख ही है और मूर्ख पर बुद्धिमान शासन करेगा ही और इसलिए भी बड़ी संख्या में शिक्षा का अच्छा-खासा प्रतिशत होने के बावजूद भी महिला गुलाम है और पुरूषों के द्वारा हैंडल की जा रही है।
दोषपूर्ण परवरिश का मतलब यह कि एक ही घर में बेटा-बेटी के खान-पान और स्कूली शिक्षा में भी विभेद किया जाना, न केवल इतना बल्कि बेटा बच्चा को क्षमतावान और बेटी होने की वजह से लड़की बच्चा को कमतर शुरू से करार देना, उसकी मांग और जरूरत को शुरू से नजर अंदाज करना जैसे तमाम बातें लड़की को अपने ही नजर में गिरा देता है और दवाब में जीते जीते वह स्वयं भी लायक समझना भूलने लगती है, जब वह लायक नहीं तो अधिकार कैसा और इसकी मांग भी क्यों? दोषपूर्ण परवरिश एक तरह का सम्मोहन है जो उसे गुलाम जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है और इसे वह जीते रहती है, शायद आजीवन।

महिला की चुप्पी, धैर्य या बेइज्जती सहने को इज्जत या बड़प्पन का नाम दिया जाना

महिला ममतामयी, सहनशील, प्रेममयी होती है, जैसे शब्द महिला के विकास और बराबरी के अधिकार में बाधक है। यह शब्द तभी सार्थक है जब सामने वाला भी ऐसा ही हो, नहीं तो इज्जत और प्रतिष्ठा के नाम पर इन शब्दों का काम सिर्फ पुरूष व पुरूषवादी लोगों द्वारा अपना उल्लू सीधा करने के लिए होकर है और कुछ नहीं। जबकि सच यही है कि अगर महिला में प्रेम, ममता जैसे भाव तो उसी महिला में गुस्सा और विद्रोही भाव भी है अगर उसके इन गुणों का अधिक गुणगान किया जाता है स्वभाविक नहीं माना जाता है, उसकी प्रशंसा कर उसे उल्लू बनाए रखने का प्रयास किया जाता है ताकि वह अपने प्रशंसा में ही मगन रहे और वास्तविकता से आंखें मूंदी रखें। जब तक महिला अपनी दोनों आंखें खोल कर नहीं रहेंगी और दिमाग को भी दुरूस्त नहीं रखेंगी, आजादी उसकी संभव नहीं।

जागरूकता और महिला से संबंधित अधिकार और कानून से अनभिज्ञता
ये चीजें महिला को अपने तथा आसपास के वातावरण के प्रति एक पैनी दृष्टि रखने की जरूरत पर जोर देता है। साथ ही महिला को जागरूक करने के लिए उसके लिए जागरूकता अभियान चलना भी जरूरी होगा। जब महिला को खुद ही अपना अधिकार पता नहीं होगा, वह कैसे अपने लिए आवाज उठा सकती है और कैसे मूल अधिकार में हनन होते देख विरोध कर सकती है। इसलिए हर महिला को अपना कर्Ÿाव्य ही नहीं, अपने अधिकार के बारेे में भी पता होना चाहिए।

विकल्पहीनता और आर्थिक निर्भरता की कमी

महिला के शरीर को मंदिर जैसे पूजनीय समझा जाना और वह भी ऐसा मंदिर जिसमें उसका वैध साथी को छोड़कर कोई और छू ले तो अपवित्र हो जाए। वैसे किसी अन्य से संबंध हो जाने पर गर्भ की आशंका और आगामी बच्चें के प्रति जिम्मेदारी जरूर अवैध संबंध से दूर रहने की जरूरत पर जोर देता है मगर सामाजिक जरूरत इसलीए भी उसे दूर रहने की सलाह या मजबूरी देता है कि चाहे बच्चा हो या ना हो, मगर समाज किसी अन्य के साथ संबंध बन जाने पर ऐसी लड़की को अपवित्र करार देता है और उसकी शादी होनी मुश्किल हो जाती है, उसे कोई स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो पाता। ये वजह जहां मायके में लड़की को सीमित और सुरक्षित जगहों पर ही यात्रा करने के लिए उसे सचेत करते हैं, वही ससुराल में यह वजह उसे हिंसक पति या साथी को भी झेलने के लिए मजबूर करता है। दूसरा क्योंकि उसके पास अपना घर नहीं होता, मायके वाले भी सिर्फ बेटी की शादी तक की जिम्मेवारी रखते हैं, उसे घर या मजबूती गिफ्ट करने के बारे में नहीं सोचते हैं। इसलिए भी गुलामी के साथ जीने में ही उसे भलाई लगती है, बजाय अपनी आवाज उठाकर या जुर्म के विरूद्ध बोलकर अपने लिए नई मुसीबत मोल लेना। आर्थिक निर्भरता की कमी से तात्पर्य बड़ी संख्या में महिलाओं का कामकाजी नहीं होना है। अगर महिला अपनी जिम्मेदारी उठाने में खुद सक्षम नहीं है और उसे भरण-पोषण के लिए पति या ससुराल वालों पर निर्भर रहना पड़ रहा है तो उसकी स्वतंत्रता की मांग शायद बेमानी है।

शारीरिक रूप से प्रकृतिपरक महिला का पुरूषों की तुलना में कमजोर होना व विरोध की स्थिति में शारीरिक हिंसा का डर

ये वो बातें है जो महिला को पुरूष का शासन चुपचाप मानने के लिए मजबूर करता है क्योंकि कितने ही परिवार में महिला-पुरूष में झगड़ा होने पर वह खतम पुरूष द्वारा महिला पर हाथ उठाने से खतम होता है और शायद गिने-चुने महिला ही ऐसी होगी, जिसे पति का या पुरूषवादी समाज का यह थप्पड़ या प्रसाद न मिला हो। अलग बात कि कोई स्वीकारे, कोई न स्वीकारे और शायद ये इतनी कॉमन बातें है कि इस पर शायद चर्चा भी नहीं होती। हो भी कैसे, महिला को पता होता है कि वह शारीरिक ताकत में पुरूष से कमतर है, तब अगर पुरूष ने विरोध करने पर हाथ उठाया तो बदले में अगर वह भी उठाएंगी तो वह जीत नहीं पाएगी, ऐसी परिस्थिति में पुरूष की सŸाा चुपचाप स्वीकार करना ही विकल्प बचता है, अगर अलग रहने का उसके पास ताकत नहीं है।

महिला का खुद पर आत्मविश्वास का नहीं होना

महिलाओं में सबसे आवश्यक जो होना चाहिए, वह है उसका खुद पर आत्मविश्वास जो प्रायः महिला में नहीं होता है, जब महिला खुद ही ये समझ ले कि वह पुरूष से कमतर और जो पुरूष कर सकती है, वह खुद नहीं कर सकती तो कैसे उसकी आजादी संभव है। बाहरी काम में पुरूष की मदद जरूरी समझना व अकेले कही जाने से घबराना, यह उसकी हीनता का प्रतीक है। हीनता का यह उदाहरण भी कि अगर ससुराल में कोई विवाद हो तो वह उस समस्या का समाधान खुद अपने सुझ-बूझ व ज्ञान से नहीं करना चाहती, और चाहती है कि इन समस्याओं का समाधान उसके पिता या भाई आकर करे। ऐसी विभिन्न प्रकार की घटनाएं बताती है कि महिला में खुद पर विश्वास नहीं है और वह अपने से ज्यादा अपने पिता या भाई या पुरूष जानकार पर भरोसा कर रही हैं और अपनी समस्या सुलझाने के लिए भी वह दूसरों का मुंह ताक रही है। अर्थात् जब तक उसे खुद पर भरोसा नहीं होगा, वह कोई भी जंग कैसे जीत सकती है और कैसे गुलामी को दूर कर सकती है और कैसे पा सकती है अपना अधिकार।

अर्थात् उपरोक्त तमाम कमियां दूर हो सकती है, अगर महिला खुद पर विश्वास करना सीख जाए, और बारी-बारी से अपने तमाम कमियों को दूर करना शुरू कर दें तो महिला भी निश्चित ही खुश, सुखद व स्वतंत्र जीवन जी सकती है। महिला पक्षधर और अच्छे लेखकों का भी कर्Ÿाव्य कि महिलाओं की संघर्ष व उसके आजादी के कहानी को अधिक से अधिक जगह दे। महिलाओं में स्थित इन सब कमियों को उसे प्रोत्साहित कर और उसे आगे बढ़ने के अवसर मुहैया कराकर रोका जा सकता है। वैसे पुरूषवादी यह समाज महिलाओं के गुलामी से नहीं, उसकी फरफड़ाते पंख देख डर रहा है। जैसे-जैसे विज्ञान और जागरूकता की हवा महिला तक भी पहुंच रही है, महिला सबल हो भी रही है और सशक्त महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। मगर अभी मंजिल दूर है और अपनी आजादी के लिए महिलाओं को अभी कितने ही कठिन सफर पूरे करने हैं।

महिला अधिकार अभियान, अगस्त 2015 का संपादकीय..