Tuesday, 8 September 2015

कन्या सशक्तीकरण का सवाल कठघरे में --कुलीना कुमारी

कन्या सशक्तिकरण मतलब कन्या या बालिका की मजबूती और उसके विकास के लिए किया जाने वाला तमाम प्रयास। इस हेतु राष्ट्रीय व राज्यीय स्तर पर योजनाएं भी कई है और प्रावधान भी कई मगर आज भी भारतीय परिदृश्य में कन्याओं या बालिकाओं की दुर्दशा हमें बता रही है कि इसका बहुत लाभ बच्चियों को नहीं मिल पा रहा है। पुरूषवादी नीति, महिलाओं के प्रति दुर्भावना और उसे दोयम दर्जे का माने जाने वाला भाव जैसे नकारात्मक माहौल का शिकार आज भी बड़ी संख्या में लड़कियां है।

2011 की जनगणना के अनुसार, 1000 लड़कों की तुलना में मात्र 940 लड़कियां है, यद्यपि यह 2001 की तुलना में 7 अधिक है। मगर लड़कों से कम लड़कियांें की संख्या हमें बताती है कि अभी भी लड़कियों के लिए माहौल अच्छा नहीं। कन्या भ्रूण हत्या प्रतिबंधित किए जाने के बाद भी इसका चालू रहना या फिर विभिन्न तरीकों के माध्यम से लड़की बच्चों के प्रति समाज में जारी अरूचि का यह संकेत है।

शिक्षा के स्तर में भी बालिका और बालक के बीच बड़ा गैप है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार, भारत के प्रायमरी और सेकेंडरी एजुकेशन के पब्लिक और प्रायवेट स्कूली मापन के हिसाब से इसका अनुपात 2011 में 98.40 था। यह आंकड़ा बताता है कि आज भी शैक्षिक स्तर पर एक ही घर में कैसे लड़का-लड़की में भेद किया जाता होगा या किया जाता है, तभी तो इन दोनों के अनुपात में इतना बड़ा फर्क है या लड़कियों की स्थिति लड़कों की तुलना में इतना कमतर है।

प्रायः यह भी देखा गया है कि अभिभावक बेटा बच्चा को प्रायवेट स्कूल में भेज देते हैं मगर बेटी को सरकारी में क्योंकि सरकारी स्कूल में एक प्रकार की मुफ्त शिक्षा मिलती है जबकि प्रायवेट स्कूल मंहगी। बेटी के लिए क्यों पैसे खर्च करें। ऐसे कितने ही परिवार पाए जाते हैं और जिन्हें बेटा’-बेटी दोनों है, उनका लड़का प्रायवेट स्कूल में पढता है बल्कि बेटी सरकारी स्कूल में। वैसे सरकारी स्कूल मे किताबें व ड्रेस तथा पढ़ाई के खर्चे के लिए विद्यार्थी को कुछ सहयोग राशि भी मिलता है, और लंच भी। मगर इसके बावजूद भी समय-समय पर सरकारी स्कूल के शैक्षिक गुणवŸाा पर प्रश्नचिन्ह लगाया जाता रहता है। कैसे लगाया भी ना जाए, शिक्षक बच्चे का अनुपात बहुत कम और भवन, शौचालय और साफ-सफाई की व्यवस्था भी ठीक नहीं पाई जाती, उसकी सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है। विशेषकर ग्रामीण इलाकों में तो और बुरा हाल है। बहुत सारे स्कूल ऐसे पाए जाते हैं, जिसे बाऊंड्री बॉल से घेरा नहीं जाता और सिक्यूरिटी गार्ड की व्यवस्था नहीं रहती। इसीलिए सरकारी स्कूल में भी लड़की की सुरक्षा संशय में रहती है और वहां से बच्चे चोरी की घटनाएं भी सुनने को आती रहती है। सरकारी स्कूल के इस अव्यवस्था से कुछ बड़े नुकसान, एक तो सुरक्षा में प्रश्न चिन्ह लगने से अभिभावक बेटियों को स्कूल नहीं भेजना चाहेंगे या कम भेजेंगे, दूसरा अव्यवस्था से शिक्षण प्रक्रिया को ग्रहण करने में व पठन-पाठन को बेहतर तरीके से समझने में दिक्कत होगी क्योंकि परेशानियां नई चीजें को ग्रहण करने में व उसके प्रति रूचि पैदा करने में कठिनाइयां लाती है। तीसरा, शिक्षक के कम होने से व पूरा अध्ययन अध्यापन ठीक तरीके से नहीं कराए जाने से लड़की बच्चों के प्रतियोगिता में बेहतर कर दिखाने मंे दिक्कत होगी। वैसे जहां भी लड़कियों को मौका मिला है, उसने बेहतर परफॉरमेंस करके दिखाया है, शिक्षा व यूपीएस सी जैसे परिक्षा में टॉप कर वह दिखा चुकी है कि उसे मौका मिले तो सबसे आगे आ सकती है मगर इसके लिए मौका और लड़कियों के लिए बेहतर माहौल जरूरी है। मोदी द्वारा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की योजना का आरंभ बालिका सशक्तिकरण के उद्देश्य से किया गया है मगर इसका कितना लाभ मिला, यह तो भविष्य ही बताएगा। वैसे सिंगल लड़की के लिए भी कई सुविधाएं सरकार के तरफ से दी जाती है। शिक्षा लोन व विवाह के लिए भी कुछ राहत राशि संबंधी भी योजनाएं चल रही है। बालिका सशक्तिकरण के उद्देश्य से  प्रधानमंत्री द्वारा ‘कन्या समृद्धि योजना’ का भी शुभारंभ किया गया है। इसमें रेट ऑफ इंटेरेस्ट अधिक मिलते हैं। मगर प्रश्न तो यह भी है कि जिस अभिभावक के पास वह न्यूनतम एमाउंट जमा करने की भी क्षमता नहीं, उन लड़कियों को इसका लाभ कैसे मिलेगा। और कोई भी योजना, जब इसकी जानकारी ना हो तो इसका लाभ कैसे लिया जा सकता है। अभी भी ग्रामीण इलाके में अशिक्षा, अंधविश्वास और महिलाओं को दोयम दर्जें की माने जाने वाली कुरीतियां हावी है और बहुत से गांवों में बिजली और कम्प्यूटर की सुविधा सरल नहीं तो कैसे इसका लाभ लड़की को मिले। योजनाएं चल रही है मगर इन कमियों की वजह से सभी लड़कियों तक यह नहीं पहुंच पा रही है। बालिका सशक्तिकरण की राह आसान नहीं।

वैसे  स्वास्थ्य के स्तर पर राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम चलते हैं और किशोर स्वास्थ्य संबंधी योजनाएं भी। मगर एक आंकड़े के अनुसार, विश्व की 30 प्रतिशत बच्चे कुपोषित अगर भारत में पाए जाते हैं तो भारतीय बच्चों के स्वास्थ्य का स्तर आराम से लगाया जा सकता है।

ऐसे ही चाइल्ड लेबर भी एक बड़ी समस्या है। 2011 के जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, 5-14 साल के बच्चे जो कार्यरत है, उनकी संख्या 43.53 लाख पाई गई। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में भारत, चाइल्ड लेबर के रूप में सबसे बड़ा बल है। यह आंकड़े कामकाजी बच्चों की स्थिति के साथ बहुत छोटी उमर में ही कैसे उसे झमेले में धकेला जा रहा है, उसका प्रमाण है। सरकारी तंत्र और प्रशासन मौन के रूप में अपना रोल जैसे निभा रहे हैं। रेलवे स्टेशन, रेड लाइट और अब मेट्रो स्टेशन पर भी बच्चों को भीख मांगते या विभिन्न प्रकार के सामान बेचते देखा जा सकता है। अगर इसपे नियंत्रण की मंशा होती सरकार और कानून व्यवस्था की तो ऐसा हाल नहीं होता। प्रश्न तो चाइल्ड लेबर को पकड़कर रखे जाने और उसकी शिक्षा और विकास के लिए कार्यरत तथाकथित एनजीओ पर भी है, जिन बच्चों को पकड़कर बच्चों के आश्रय स्थल में रखा जाता है, वहां भी बच्चों की स्थिति प्रायः अच्छी नहीं पायी जाती। बच्चों के लिए कार्यरत कुछ एनजीओ में ही बच्चों पर जुल्म करते हुए देखा गया और एक सर्वेक्षण के दौरान पाया कि वहां बच्चों से खाना बनवाया जा रहा था और विभिन्न तरह के कार्य करवाए जा रहे थे। रिपोर्ट से यह भी पता चला कि कितने ही बच्चे मौका मिलते ही भाग जाते हैं। ऐसा क्यों होता है, सोचना मुश्किल नहीं।

बच्चों की सुरक्षा और व्यापार भी एक बड़ी समस्या है। 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुमानतः 135,000 बच्चे हर साल ट्रैफिक्रिग के शिकार होते हैं। ये बच्चे बंधुआ मजदूर, घरेलू नौकर, भीख मांगने या फिर सेक्सुअली कार्य के लिए रेड लाइट एरिया में बेच दिए जाते हैं।
ऐसे ही लड़कियों की सुरक्षा को लेकर भी सोचनीय स्थिति है।  यूनिसेफ द्वारा किए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 15-19 साल की 5 प्रतिशत भारतीय लड़कियां यौन हिंसा की पीड़ित पाई गई।
ऐसे ही बाल विवाह भी भारत मंे जारी जबकि यहां भी कानूनी रूप से प्रतिबंधित है । एक आंकड़े के अुनसार, विश्व में होने वाले तमाम बाल ,विवाह में से 40 प्रतिशत भारत में होते है। राजस्थान, आंध्र प्रदेश, बिहार, उŸार प्रदेश और मध्य प्रदेश आदि बाल विवाह में आगे है।

मगर कन्या सशक्तिकरण के लिए सफर यही तक नहीं और कठिनाइयां भी कम नहीं। इन तमाम दिक्कतों के अलावा लड़की का शादी के बाद दूसरे घर जाना, और लड़की की इज्जत बनाम सुरक्षा का प्रश्न घरेलू और सामाजिक स्तर पर हावी है। पराया धन कहे जाने से मां-बाप भी उसे जैसे पराया ही समझ लेते हैं और शायद अधिकतर घरों में लड़की के लिए उतना ही शिक्षा, विकास और अधिकार जरूरी समझा जाता है, जितना शादी के लिए जरूरी है। वही बेटा बच्चा को अपना समझा जाता है और उसके विस्तार और विकास की असीमित कोशिश की जाती है। फिर लड़की के लिए सुरक्षा का प्रश्न उसके दायरे सीमित कर देते हैं और उसे रेप और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं से बचाने की भावना प्रबल हो जाती है। वैसे उसके दायरे इसलिए भी सीमित कर दिए जाते हैं  और उसे मां-बाप या समाज के द्वारा ही गुलाम बनाए रखने की मंशा कायम रहती है ताकि ससुराल में बिटिया बस सकें और वहां से लड़ झगड़कर या उनका जुल्म सहने से मना कर वापस ना आए। क्योंकि समाज
पुरूषवादी तो महिला को हिस्सा और हक ना मायके वाले को देने की मंशा हुई है और ना ही ससुराल वालों की।

अतः घरेलू, सामाजिक और कानूनी जब तीनों प्रकार की स्थितियां लड़कियों के अनुकूल होगी, तभी  कन्या सशक्तिकरण के रास्ते अधिक तेजी से खुल पाएंगे। यद्यपि जागरूकता आई है और पहले से बेहतर स्थिति भी लड़कियों के लिए हुई है। कन्या सशक्तिकरण योजना व सरकारी सुविधा ने महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार आसानी से खोले हैं और लड़की के लिए लाभ की योजना ने मां-बाप को लड़की को आगे कर उसका लाभ उठाना सिखा रहा है और अवसर मिलने पर लड़कियां खुद को साबित भी कर रही है मगर योजनाआंे का लाभ तक ही अगर बेटी को आगे बढ़ाया जाए तो निश्चित ही अब भी लड़कियों की राहंे दुर्गम है, और इनसे आगे निकलने के रास्ते अभी और तलाशने होंगे। इसके लिए सरकारी नीतियों के साथ-साथ घरेलू और समाजिक नियमांे की पुनः समीक्षा और लड़कियों के प्रति दोयम दर्जे वाला भाव दूर करने हेतु अभी और पहल करने की जरूरत है।

Thursday, 3 September 2015

महिला स्वतंत्रता के मायने -कुलीना कुमारी

भारत अपना 69वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है, ये बहुत खुशी और गौरव की बात है कि हम आजाद देश के वासी अब कहलाते हैं मगर क्या इस आजाद देश में महिलाएं भी आजाद है, उसे भी स्वतंत्रता मिली है क्या? इस सवाल की पड़ताल करना ना केवल किसी बुद्धिजीवी व विचारक के लिए जरूरी है बल्कि देश की आधी आबादी महिला की होने की वजह से भी आवश्यक है।

यद्यपि मुट्ठी भर महिलाओं की स्थिति अच्छी दिख रही है और विभिन्न क्षेत्रों में वे अपने को स्थापित भी करते दिख रही है मगर अधिकतर महिलाओं की स्थिति चिंताजनक है। बहुसंख्य महिलाओं की गुलाम और पुरूषों की तुलना में कमतर स्थिति देखते हुए कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता दिवस का मतलब पुरूषों के लिए ही है, बहुसंख्य महिला के लिए इसका जश्न मनाने का समय अभी नहीं आया है।

वैसे जब बात चल रही है स्वतंत्रता की तो क्यों न इसका अर्थ समझ लिया जाए। सैद्धांतिक रूप से स्वतंत्रता के जो भी मायने हो मगर व्यवहारिक रूप से स्वतंत्रता का मतलब अपने मन से खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने की आजादी के साथ-साथ अपने पसंद का साथी चुनने का अधिकार शामिल है, इसमें अपने मन से जीवन जीने का तरीका के साथ-साथ अपने विकास व खुशी के लिए नौकरी व अन्य सुविधाएं चुनने का अधिकार और अपने को अभिव्यक्त करने का हक जैसी तमाम बातें शामिल मानी जा सकती है। ये सब चीजें पुरूष आसानी से प्राप्त कर लेते हैं मगर महिला को इस सब मामले में पुरूष का पिछलग्गु बना दिया है और उसके लिए वही अधिकार उपयुक्त समझा गया है जिसमें पुरूष सदस्य का मुहर लग जाए। गिनी-चुनी महिलाओं को ही ये परमिशन मिल पाता है या वे ले पाती है व उन्हें अपने मन से काम करने की या समाज के बीच उठने-बैठने की आजादी देखी जाती है।
अधिकतर महिला आज भी दोयम दर्जे का जीवन जीते देखी जा रही है। महिला के लिए घर की चारदीवारी ही सबसे सुंदर व सुरक्षित क्षेत्र मानी गई है, इसके अंदर वो चाहे तो कुछ भी कर लें, बाहरी कार्यों के लिए पुरूष की परमिशन और उसका या किसी का साथ जरूरी माना जाता है जैसे वह व्यक्ति ना होकर एक वस्तु हो, जिसे अकेले जाने पर कोई लेकर उसे उड़ जाएगा। यद्यपि कभी कभार अनहोनियां भी होती है मगर वो तो किसी के साथ भी हो सकती है। ठीक है, छेड़छाड़ या रेप की घटनाएं महिलाओं के साथ ही होती है या हो सकती है, मगर इससे तो डटकर लड़ा जा सकता है, अगर कोई इसकी शिकार हो भी जाए तो क्या यह आजादी से बड़ी तो नहीं जो इससे डरकर घर में बंद रहना या गुलाम रहना स्वीकारा जाय, गलत है यह। जो इज्जत के नाम पर महिलाओं को गुलाम बनाए रखने की यह हथकंडा अपनाते हैं, विशेषकर उनसे बताना चाहती हूं कि इस इज्जत का मखौल व उपयोग या दुरूपयोग सबसे ज्यादा घरवाले व महिला के जानने वाले ही करते हैं, रेप के आंकड़े बताते हैं कि 4 में से 3 रेप के आरोपी तो महिला के परिजन या पहचान के लोग ही पाए जाते हैं, फिर भी महिला को क्यों इसका डर दिखाया जाता है और दबाकर रखने की कोशिश की क्यों की जाती है? वजह साफ है, किसी न किसी वजह से पुरूषवादी सŸाा द्वारा उसे वश में रखने का प्रयास किया जाता है और इसमें पुरूषवादी समाज काफी हद तक सफल भी है। महिला को बंद करके रखने की बड़ी वजह यह हो सकती है कि पुरूषवादी समाज डरता है कि उसके काले कारनामे महिला उजागर ना कर दे और फिर उसका रीति-रीवाज या धर्म के नाम पर उसका उल्लू सीधा करने में दिक्कत ना हो जाए। शायद इसलिए वह महिला पर पाबंदियां लगाता है कि बाहर-भीतर करने से कही महिला जागरूक और अपने अधिकार के प्रति प्रतिबद्ध ना हो जाए और फिर उसकी जुल्म और गुलामी मानने से इंकार ना कर दें, इसीलिए पुरूषवादी समाज महिला को महिला को बंद करके रखना चाहता है, मगर सवाल यह भी है कि महिला ही क्यों ये सारी वंदिशें सहती है? वे कौन सी वजह है, जिस कारण आज भी महिला गुलामी में जीने के लिए अभिशप्त है? क्या महिला इतनी कमजोर है कि वह आजाद हो ही नहीं सकती, ऐसे कौन से जकड़न और मानसिकता है जो महिला को आज भी गुलाम रहने के लिए मजबूर करती है? अथवा वे कौन कारक है जो महिलाओं के विकास में अवरोधक है और उसके सशक्तिकरण के राह में बाधक बने हैं। ऐसे तमाम सवाल है, जिसकी पड़ताल किया जाना जरूरी है। इसी परिप्रेक्ष्य पर एक नजर.. वैसे तो महिलाओं की गुलामी की कई सारी वजह हो सकते हैं मगर मेरे ख्याल से इसके कुछ प्रमुख वजह है, जिसकी वजह से आज भी महिला गुलामी में जीने के लिए अभिशप्त है?

पहचान का अभाव

आज भी हमारे समाज में बेटी का जन्म खुशी की बात नहीं मानी जाती और इसके अतिरिक्त उसकी पहचान के लिए भी कोई प्रयास नहीं किया जाता, लड़की किसी की बेटी, बहन, पत्नी या मां होती है। शायद लोगों को यह मजाक लगता हो मगर अधिकतर लोग जानते हैं कि विशेषकर ससुराल में उसे अपने पति की पत्नी या बच्चे की मां के रूप में ही संबोधित किया जाता है। जब उसकी पहचान ही नहीं तो आजादी किस बात की, जिसकी पहचान होती है, उसे अपनी आजादी लेना भी आ जाता है मगर बचपन से ही अपने पहचान के प्रति प्रोत्साहित करने वाले बहुत कम खुशनसीब बेटियां पाई जाती है और ऐसे ही खुशनसीब बेटियां अपनी गुणात्मक शिक्षा, बुद्धिमानी से आजाद व सुंदर जीवन जी पा रही है।

अशिक्षा, अव्यवहारिक शिक्षा और दोषपूर्ण परवरिश
शिक्षा की कमी, पुरूष पर निर्भरता और महिला में आत्मबल का अभाव भी उसे गुलाम जीवन जीने के लिए मजबूर करता है। ना केवल इतना बल्कि एक बहुत जरूरी और नोट करने वाली बात यह भी है कि क्यों शिक्षित महिला भी जिसने उच्च शिक्षा भी प्राप्त कर रखी है, क्यों गुलाम होकर जीवन जी रही है, इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उसने शिक्षा तो प्राप्त की है, मगर शिक्षा प्राप्त की है सिर्फ किताबी, उसे जीवन की व्यवहारिकता का ज्ञान नहीं है और जब इसका ज्ञान नहीं है तो निश्चित ही वह पढ़ लिखकर भी एक प्रकार का मूर्ख ही है और मूर्ख पर बुद्धिमान शासन करेगा ही और इसलिए भी बड़ी संख्या में शिक्षा का अच्छा-खासा प्रतिशत होने के बावजूद भी महिला गुलाम है और पुरूषों के द्वारा हैंडल की जा रही है।
दोषपूर्ण परवरिश का मतलब यह कि एक ही घर में बेटा-बेटी के खान-पान और स्कूली शिक्षा में भी विभेद किया जाना, न केवल इतना बल्कि बेटा बच्चा को क्षमतावान और बेटी होने की वजह से लड़की बच्चा को कमतर शुरू से करार देना, उसकी मांग और जरूरत को शुरू से नजर अंदाज करना जैसे तमाम बातें लड़की को अपने ही नजर में गिरा देता है और दवाब में जीते जीते वह स्वयं भी लायक समझना भूलने लगती है, जब वह लायक नहीं तो अधिकार कैसा और इसकी मांग भी क्यों? दोषपूर्ण परवरिश एक तरह का सम्मोहन है जो उसे गुलाम जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है और इसे वह जीते रहती है, शायद आजीवन।

महिला की चुप्पी, धैर्य या बेइज्जती सहने को इज्जत या बड़प्पन का नाम दिया जाना

महिला ममतामयी, सहनशील, प्रेममयी होती है, जैसे शब्द महिला के विकास और बराबरी के अधिकार में बाधक है। यह शब्द तभी सार्थक है जब सामने वाला भी ऐसा ही हो, नहीं तो इज्जत और प्रतिष्ठा के नाम पर इन शब्दों का काम सिर्फ पुरूष व पुरूषवादी लोगों द्वारा अपना उल्लू सीधा करने के लिए होकर है और कुछ नहीं। जबकि सच यही है कि अगर महिला में प्रेम, ममता जैसे भाव तो उसी महिला में गुस्सा और विद्रोही भाव भी है अगर उसके इन गुणों का अधिक गुणगान किया जाता है स्वभाविक नहीं माना जाता है, उसकी प्रशंसा कर उसे उल्लू बनाए रखने का प्रयास किया जाता है ताकि वह अपने प्रशंसा में ही मगन रहे और वास्तविकता से आंखें मूंदी रखें। जब तक महिला अपनी दोनों आंखें खोल कर नहीं रहेंगी और दिमाग को भी दुरूस्त नहीं रखेंगी, आजादी उसकी संभव नहीं।

जागरूकता और महिला से संबंधित अधिकार और कानून से अनभिज्ञता
ये चीजें महिला को अपने तथा आसपास के वातावरण के प्रति एक पैनी दृष्टि रखने की जरूरत पर जोर देता है। साथ ही महिला को जागरूक करने के लिए उसके लिए जागरूकता अभियान चलना भी जरूरी होगा। जब महिला को खुद ही अपना अधिकार पता नहीं होगा, वह कैसे अपने लिए आवाज उठा सकती है और कैसे मूल अधिकार में हनन होते देख विरोध कर सकती है। इसलिए हर महिला को अपना कर्Ÿाव्य ही नहीं, अपने अधिकार के बारेे में भी पता होना चाहिए।

विकल्पहीनता और आर्थिक निर्भरता की कमी

महिला के शरीर को मंदिर जैसे पूजनीय समझा जाना और वह भी ऐसा मंदिर जिसमें उसका वैध साथी को छोड़कर कोई और छू ले तो अपवित्र हो जाए। वैसे किसी अन्य से संबंध हो जाने पर गर्भ की आशंका और आगामी बच्चें के प्रति जिम्मेदारी जरूर अवैध संबंध से दूर रहने की जरूरत पर जोर देता है मगर सामाजिक जरूरत इसलीए भी उसे दूर रहने की सलाह या मजबूरी देता है कि चाहे बच्चा हो या ना हो, मगर समाज किसी अन्य के साथ संबंध बन जाने पर ऐसी लड़की को अपवित्र करार देता है और उसकी शादी होनी मुश्किल हो जाती है, उसे कोई स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो पाता। ये वजह जहां मायके में लड़की को सीमित और सुरक्षित जगहों पर ही यात्रा करने के लिए उसे सचेत करते हैं, वही ससुराल में यह वजह उसे हिंसक पति या साथी को भी झेलने के लिए मजबूर करता है। दूसरा क्योंकि उसके पास अपना घर नहीं होता, मायके वाले भी सिर्फ बेटी की शादी तक की जिम्मेवारी रखते हैं, उसे घर या मजबूती गिफ्ट करने के बारे में नहीं सोचते हैं। इसलिए भी गुलामी के साथ जीने में ही उसे भलाई लगती है, बजाय अपनी आवाज उठाकर या जुर्म के विरूद्ध बोलकर अपने लिए नई मुसीबत मोल लेना। आर्थिक निर्भरता की कमी से तात्पर्य बड़ी संख्या में महिलाओं का कामकाजी नहीं होना है। अगर महिला अपनी जिम्मेदारी उठाने में खुद सक्षम नहीं है और उसे भरण-पोषण के लिए पति या ससुराल वालों पर निर्भर रहना पड़ रहा है तो उसकी स्वतंत्रता की मांग शायद बेमानी है।

शारीरिक रूप से प्रकृतिपरक महिला का पुरूषों की तुलना में कमजोर होना व विरोध की स्थिति में शारीरिक हिंसा का डर

ये वो बातें है जो महिला को पुरूष का शासन चुपचाप मानने के लिए मजबूर करता है क्योंकि कितने ही परिवार में महिला-पुरूष में झगड़ा होने पर वह खतम पुरूष द्वारा महिला पर हाथ उठाने से खतम होता है और शायद गिने-चुने महिला ही ऐसी होगी, जिसे पति का या पुरूषवादी समाज का यह थप्पड़ या प्रसाद न मिला हो। अलग बात कि कोई स्वीकारे, कोई न स्वीकारे और शायद ये इतनी कॉमन बातें है कि इस पर शायद चर्चा भी नहीं होती। हो भी कैसे, महिला को पता होता है कि वह शारीरिक ताकत में पुरूष से कमतर है, तब अगर पुरूष ने विरोध करने पर हाथ उठाया तो बदले में अगर वह भी उठाएंगी तो वह जीत नहीं पाएगी, ऐसी परिस्थिति में पुरूष की सŸाा चुपचाप स्वीकार करना ही विकल्प बचता है, अगर अलग रहने का उसके पास ताकत नहीं है।

महिला का खुद पर आत्मविश्वास का नहीं होना

महिलाओं में सबसे आवश्यक जो होना चाहिए, वह है उसका खुद पर आत्मविश्वास जो प्रायः महिला में नहीं होता है, जब महिला खुद ही ये समझ ले कि वह पुरूष से कमतर और जो पुरूष कर सकती है, वह खुद नहीं कर सकती तो कैसे उसकी आजादी संभव है। बाहरी काम में पुरूष की मदद जरूरी समझना व अकेले कही जाने से घबराना, यह उसकी हीनता का प्रतीक है। हीनता का यह उदाहरण भी कि अगर ससुराल में कोई विवाद हो तो वह उस समस्या का समाधान खुद अपने सुझ-बूझ व ज्ञान से नहीं करना चाहती, और चाहती है कि इन समस्याओं का समाधान उसके पिता या भाई आकर करे। ऐसी विभिन्न प्रकार की घटनाएं बताती है कि महिला में खुद पर विश्वास नहीं है और वह अपने से ज्यादा अपने पिता या भाई या पुरूष जानकार पर भरोसा कर रही हैं और अपनी समस्या सुलझाने के लिए भी वह दूसरों का मुंह ताक रही है। अर्थात् जब तक उसे खुद पर भरोसा नहीं होगा, वह कोई भी जंग कैसे जीत सकती है और कैसे गुलामी को दूर कर सकती है और कैसे पा सकती है अपना अधिकार।

अर्थात् उपरोक्त तमाम कमियां दूर हो सकती है, अगर महिला खुद पर विश्वास करना सीख जाए, और बारी-बारी से अपने तमाम कमियों को दूर करना शुरू कर दें तो महिला भी निश्चित ही खुश, सुखद व स्वतंत्र जीवन जी सकती है। महिला पक्षधर और अच्छे लेखकों का भी कर्Ÿाव्य कि महिलाओं की संघर्ष व उसके आजादी के कहानी को अधिक से अधिक जगह दे। महिलाओं में स्थित इन सब कमियों को उसे प्रोत्साहित कर और उसे आगे बढ़ने के अवसर मुहैया कराकर रोका जा सकता है। वैसे पुरूषवादी यह समाज महिलाओं के गुलामी से नहीं, उसकी फरफड़ाते पंख देख डर रहा है। जैसे-जैसे विज्ञान और जागरूकता की हवा महिला तक भी पहुंच रही है, महिला सबल हो भी रही है और सशक्त महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। मगर अभी मंजिल दूर है और अपनी आजादी के लिए महिलाओं को अभी कितने ही कठिन सफर पूरे करने हैं।

महिला अधिकार अभियान, अगस्त 2015 का संपादकीय..

Tuesday, 16 June 2015

पीछे क्यों हो पुरुषों से -कुलीना कुमारी

पुरुष के साथ ही आयी हो तो पीछे क्यों हो पुरुषों से
बल-बुद्धि में कम नहीं हो तो आहत क्यों हो बरसों से

घर में तुम्हीं क्यों रहो
क्यों सेवा तुम्हीं करो
खुद पे निर्भर तुम भी हो
कुछ अपना तुम भी करो
अपनी क्षमता से ज्यादा विश्वास नहीं है
पराधीनता से बढ़कर अभिशाप नहीं है
आजादी तुम्हें पुकारे, थाम लो उसको हरषों से
बल-बुद्धि में कम नहीं हो तो आहत क्यों हो बरसों से

शोषण जब तुम पर हो
कमजोर न खुद को जानो
बेइज्जत जो तुम्हें करे
सिंदूर न उसको मानो
जो तुम्हें सताए
सताओ उसको तुम भी
जो तुम्हे गिराए
गिरा दो उसको तुम भी
तलवार से जो तुमको मारे, तुम मारो उसको फरसों से
बल-बुद्धि में कम नहीं हो तो आहत क्यों हो बरसों से

अगर बदलना चाहे तो
तकदीर बदल जाता है
सच पर चलने वाला तो
तस्वीर बदल देता है
पर कही कमी है तुझमें
जो फल अब तक नहीं मिला
जिसके तुम हकदार हो
वो हक अब तक नहीं मिला
कहो इन्कलाब से तुम क्यों डरो, पूछे मन मेरा अरसों से
बल-बुद्धि में कम नहीं हो तो आहत क्यो हो बरसों से

पुरुष के साथ ही आयी हो तो पीछे क्यों हो पुरुषों से
बल-बुद्धि में कम नहीं हो तो आहत क्यों हो बरसों से

पर्यावरण स्वच्छता-सबका दायित्व -कुलीना कुमारी

हर साल 5 जून को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। पर्यावरण का सीधा संबंध प्रकृति से है और इसके बिना मानव का अस्तित्व नहीं। अथवा अगर पर्यावरण प्रदूषित रहेगी तो उसका असर मानव जीवन पर भी पड़ेगा ही। पर्यावरण के अंतर्गत हमारे आस-पास का सारा माहौल शामिल है-जैसे जल, वायु, भूमि-इन तीनों से संबंधित कारक तथा मानव, पौधे, सूक्ष्म जीव व अन्य जीवित पदार्थ इस पर्यावरण के अंतर्गत आते हैं। मगर मानव द्वारा आवश्यकता से अधिक प्रकृति का दोहन या उसके विभिन्न कार्य-कलापों की वजह से प्रकृति के तीन मुख्य स्रोत, भूमि, जल तथा वायु प्रदूषित होता जा रहा है।
दिनोनदिन पर्यावरण की बिगड़ती हालात विश्व पटल पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया।
इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का जन्म हुआ तथा प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। तथा इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को प्रेरित करना था।
उक्त गोष्ठी में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने ‘पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव’ विषय पर व्याख्यान दिया था। पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में यह भारत का प्रारंभिक कदम था। तभी से हम प्रति वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे हैं।
इस तरफ पहल करते हुए 19 नवंबर 1986 से पर्यावरण संरक्षण लागू हुआ।
उसके बाद से करीब करीब हर साल अपने भारत में पर्यावरण दिवस के अवसर पर कई प्रकार के सकारात्मक पहल की बात की जाती है मगर यह वास्तविकता के धरातल पर कम ही उसका उपयोग किया जाता है। आज भी भारत में पर्यावरण प्रदूषण एक बड़ी समस्या है व इसमें शिध्रातिशिध्र सुधार की बड़ी आवश्यकता है।

वैसे पर्यावरण प्रदूषण के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की चीजें शामिल हो सकती है मगर मुख्यतः इसे चार प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है

भूमि प्रदूषण

गंदगी विभिन्न प्रकार की बीमारियों की जड़ है। जबकि स्वच्छता हमारे अंदर सकारात्मक व स्वस्थ वातावरण प्रदान करता है। माननीय प्रधानमंत्री का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ इसी तरह का एक कदम है। मगर आज भी सार्वजनिक प्लेस पर विभिन्न प्रकार की गंदगी देखी जाती है। भारत गंदगी फैलाने में शायद अव्वल दर्जे के देशों में शामिल है, इसकी बड़ी वजह यह कि यहां नागरिक कर्Ÿाव्य का अभाव सा है। अगर कोई सार्वजनिक प्लेस पर गंदा फेंक दे तो उसे दंडित नहीं किया जाता और ना जुर्माना लिया जाता है, जबकि दूसरे देशों में सार्वजनिक स्थान को गंदा करने पर दंडित किया जाता है  तो वहां की जनता अपने देश में साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखती है।
साथ ही प्लास्टिक का थैले, बोतल तथा अन्य प्रोटक्ट में इसका अधिकााधिक प्रयोग भी पर्यावरण के लिए खतरा है, क्योंकि इसका असानी से  अपघटित नहीं होता व हजारों वर्षों तक यह भूमि में यूंही दबा रहता है व भूमि व पानी को खराब करता रहता है। साथ ही इसमें इतना जहरीला तŸव पाया जाता है कि प्लास्टिक खाने से गायों व जानवरों की बीमारियां व मौत तक हो जाती है, चिड़ियों तक को इसकी वजह से मरते हुए पाया गया है।
वैसे प्लास्टिक में रखे गरम खाने से भी व्यक्ति में विभिन्न प्रकार की बीमारियां होती है क्योंकि गरम अवस्था में खाने में प्लास्टिक के जहरीला तŸव मिल जाते हैं और वही भोजन ग्रहण करने पर व्यक्ति को विभिन्न प्रकार का नुकसान होता है जैसे कैंसर, और बहुत सारी त्वचा से संबंधित बीमारियां हो जाती हैं।
इसके अतिरिक्त खेतों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मानव अधिकाधिक रूप से कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करता है जिससे भूमि की उत्पादन क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है और एक दिन जमीन बंजर हो जाती है। इसका दूसरा दुष्प्रभाव कि अन्न और फल भी हमें दूषित प्राप्त होते हैं जो हमारे शरीर के लिए नुकसान दायक है।
भूमि प्रदूषण से नियंत्रित होने के कुछ उपाय

1. हमारे भारतीयों के लिए भी नियत किया जाना चाहिए कि गंदगी हम एक नियत स्थान या स्थानीय कूड़ा घर में ही अपने घर की गंदगी को डाले। इधर-उधर कूड़ा डालने पर दंडित किया जाना चाहिए या जुर्माना लगाया जाना चाहिए।
2. प्लास्टिक पर एक कठोर कानून बनना चाहिए क्योंकि यह सबसे ज्यादा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। जब तक बहुत जरूरी ना हो, इसका प्रयोग ना किया जाय और इसके जगह पर जूट या कपड़े का थैला का उपयोग किया जाए और उसे प्रोत्साहित किया जाए।
3. खाद्दपदार्थ को उपजाने के लिए खेतों में हमें रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग ना करके प्राकृतिक उर्वरक जैसे गोबर तथा प्राकृतिक उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।

जल प्रदूषण

फैक्ट्रियों, कंपनियों व घरों के अपशिष्ट पदार्थ जो नदियों में मिलता है, उससे जल प्रदूषित होता है, या फिर जल परिवहन द्वारा रिसने वाला रसायनिक तŸव आदि भी जल प्रदूषण का कारण है।
 धार्मिक अवसरों पर पूजा पाठ का सामान फूल, राख व मूर्Ÿिायों का विर्सजन भी जल को प्रदूषित करता है। साथ ही हमारे यहां जल को रिसाइक्लिंग की अच्छी योजना नहीं है, ंइस वजह से साफ पानी नहीं मिलता, साथ ही आज भी कितने ही जगह पर घर तक स्वच्छ पानी पहुंचाने के लिए प्रोपर वे में पाइप लाइन नहीं बिछाया गया, जहां पाइपलाइन गई भी, वहां सीवर व पानी के पाइप के बीच उचित दूरी नहीं रखी गई है, जिससे कितनी ही बार गंदा पानी सप्लाई हो जाता है और मजबूरन लोग जीने के लिए गंदा पानी पीन को अभिशप्त है और गंदे जल ग्रहण की वजह से कितनी ही बीमारियों के शिकार मनुष्य होता है। जल निकासी की व्यवस्था नहीं है इसलिए भी जहां तहां ग्रामीण इलाकों में पानी जमा हो जाता है, सड़ते हुए पानी और उसमें मिले कचड़े दूर्गांध का कारण है, जिससे मच्छर व कई तरह के बीमारियां पनपती है, या फिर वही पानी जमीन में चला जाता है। ये भी कम आश्चर्य की बात नहीं कि हमारे देश में कही लोग पानी के लिए तरसते हैं और किसी राज्य में  हर साल आने वाले बाढ से भी कई तरह के नुकसान होती है।
जल प्रदूषण दूर करने के कुछ उपाय
फैक्ट्रियों, कंपनियों व घरों के अपशिष्ट पदार्थ को पानी में विसर्जित नहीं की जाय, व जल की स्वच्छता के लिए रिसाइक्लिंग की व्यवस्था की जाय।
नए घर बनाने का तभी परमिशन दी जाय जब उसमें सौर ऊर्जा व रेन हारवेस्टिंग भी उसमें शामिल हो।
नदियों को जोड़ने की योजना बनाई जाए क्योंकि कोई राज्य बाढ से परेशान होता है मगर कई राज्य पानी तक के लिए भी तरसता है, इसका ध्यान रखते हुए अधिकाधिक पानी आने की स्थिति में जिधर की नदियां सूखी हो, उस तरफ पानी को मोड़ दिया जाय, जिससे किसी भी राज्य को परेशानी ना हो।
गंदा पानी व उसके ग्रहण से होने वाली बीमारियों से बचने के लिए वाटर प्यूरिफायर का उपयोग घर-घर में हो। बारिश का ध्यान रखते हुए जल निकासी की भी उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

वायु प्रदूषण

फैक्ट्रियों, इटा भटटी व विभिन्न प्रकार के गाड़ियों से निकलने वाले धुएं व किसी भी प्रकार के जलाए जाने वाले पदार्थ के धूएं, परमाणु व रसायनिक प्रयोग से निकलने वाले रेडिएशन आदि इसके मुख्य वजहों में शामिल है। जहरीले हवा से सांस की बीमारियां हो जात है।
नियंत्रण के उपाय
जनजीवन से दूर फैक्ट्रियां, ईटा भट्टी या धुएं निकालने वाली चीजें प्रयोग की जानी चाहिए, रसायनिक प्रयोगशाला भी मानव के समूहों से दूर रहना चाहिए।
मगर उसका दुष्प्रभाव कम करने के लिए उस आस-पास के क्षेत्र में बड़ी संख्या में पेड़-पौधे लगाई जानी चाहिए ताकि पेड़ पौधे वातावरण शुद्ध करे।
पेट्रोल या डीजल वाली गाड़ी के जगह पर सीएनजी वाली गाड़ी का उपयोग किया जाय, दिल्ली का प्रदूषण स्तर घटाने में सीएनजी गाड़ी का एक मुख्य भूमिका निभाई है। इसे उदाहरण के रूप में अन्य क्षेत्रों में भी प्रयोग किया जाना चाहिए।

ध्वनि प्रदूषण

मनुष्य के अंदर एक निश्चित सीमा तक ही आवाज या वातावरण की ध्वनि ग्रहण करना ठीक समझा गया है, इससे अधिक का शोर उसके कानेन्द्रिय को नुकसान पहुंचाता है, वह बहरा हो सकता है।
ट्रेन की आवाज, गाड़ियों का हार्न, लाउडस्पीकर का अधिक तेज बजना, कान में म्युजिक के लिए मोबाइल का लीड अधिक देर तक रखना आदि मनुष्य के सुनने की क्षमता को प्रभावित करता है।
उपाय
ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए सभी ध्वनि पैदा करने वाले गाड़ी या उपकरणों का एक सीमा नियत किया जाना चाहिए, और इसका पालन नहीं करने पर दंड या जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए।

कुलमिलाकर, पर्यावरण से तो जन-जन का संबंध है, स्वच्छ पर्यावरण होने पर स्वच्छ जमीन, अन्न, जल और वायु तीनों ही मिलेंगे और ये स्वच्छता व्यक्ति के विकास में सकारात्मक भूमिका निभाएगा।
मगर पर्यावरण स्वच्छ रखना सिर्फ सरकारी स्तर पर ही जरूरी नहीं बल्कि यह व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर भी जरूरी है। इस भूमिका में महिला की एक महŸवपूर्ण भूमिका हो सकती है। अगर स्वच्छ घर, साफ भोजन और स्वच्छ हवा मिलेगा तो ना केवल अगला पीढ़ी स्वस्थ पैदा होगा बल्कि मां के रूप में महिला एक महŸवपूर्ण भूमिका निभा सकती है। चूंकि प्राथमिक गुरू मां ही होती है, तो वह अपने बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बना सकती है, बता सकती है कि स्वच्छता कितना जरूरी है, मां अपने आस-पास क्षेत्र में पेड़ लगाए व अपने बच्चों को भी लगाना सिखाए, साथ ही ना केवल घर बल्कि अपने आस-पास के क्षेत्र को भी गंदा करने से मना करे।
समाजिक तौर पर ना केवल घर का सदस्य अपने घर को साफ रखे बल्कि अपने सामने के बाहरी क्षेत्र को भी साफ रखे, साथ ही अपने आस पड़ोस को भी गंदा करते हुए देखे तो मना करे। इसके अतिरिक्त अपने अपने क्षेत्र में क्षेत्रवासी मिलकर कुछ आदमी अपने क्षेत्र के रोड व नालियां साफ रखने के लिए रखे व सामूहिक रूप से इस हेतु मूल्य प्रदान करे, इससे क्षेत्र भी साफ रहेगा और किसी एक पर भार भी नहीं पड़ेगा।
पर्यावरण साफ रहने से कितने सारे फायदे होते हैं और यह क्यों जरूरी है, इस हेतु जगह-जगह जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किया जाए।
सामाजिक कार्यकर्Ÿाा, सामाजिक विचारक व लेखक का भी दायिŸव कि इस हेतु लोगों को जागरूक करें और सरकार पर भी दवाब बनाए कि जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए, ऐसे चीज का प्रयोग बंद किया जाय और उसका विकल्प तैयार किया जाए।
स्वच्छ पर्यावरण में ही स्वस्थ मानव का विकास संभव है और इसके लिए सबका एक-एक कदम जरूरी है।

Sunday, 14 September 2014

शिक्षक की महत्ता

-कुलीना कुमारी


सितम्बर महीना शिक्षक दिवस के लिए खास है। शिक्षक दिवस में हम शिक्षक की महŸाा पर एक बार और चर्चा करते हैं और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जताते हैं। पर शिक्षक की महŸाा किसी एक दिन या महीने तक ही सीमित नहीं, ये तो हमेशा के लिए महŸवपूर्ण है। वैसे शिक्षक दिवस हर वर्ष 5 सितम्बर को अपने देश व विशेषकर स्कूलों में शिक्षक व गुरू की महŸाा के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन हमारे प्रथम उपराष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था पर उनकी कैरियर की शुरूआत एक शिक्षक के रूप में हुई और वह एक अच्छे शिक्षक के रूप में जाने गये। हमारे ख्याल से हर पद से बड़ा गुरू का पद है, गुरू को तो मां-बाप से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। इस संदर्भ में किसी लोककवि ने लिखा है कि ‘गुरू गोबिन्द दोऊ खड़े काको लागू पांव। बलिहारी गुरू आपनी गोबिन्द दिओ चिन्हाय।।’ सही में गुरू इस सम्मान के लायक है, मां-बाप तो बच्चों को जन्म देते हैं मगर गुरू जीवन निर्बहन कैसे किया जाये, उसे शिक्षित कर न केवल उसके लिए आर्थिक आधार तैयार करते हैं बल्कि जीवन जीने का तरीका भी सिखाते हैैं।
कालांतर से विद्यार्थी और शिक्षक का रिश्ता या गुरू या शिष्य/शिष्या का रिश्ता बहुत खास रहा है, विद्यार्थी को दिशा देने में शिक्षक का योगदान अकल्पनीय रहा है। न केवल एक शिक्षार्थी के रूप में हम अपने शिक्षक से पाठ्यक्रमों से अवगत होते हैं,  बल्कि हमारे जीवन के सोच, जटिलताओं को झेलने का तरीका, हमारी नैतिकता व आगे बढ़ने की दिशाएं आदि का भी प्रभाव शिक्षक का हमारे ऊपर पड़ता है। फिर बचपन में प्रायः बच्चे का मन सजीव कच्ची मिट्टी जैसे होता हैं, उसे जैसा गढ़ा जाये या उसकी शिक्षा जैसा भी हो, उसका उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है।
आज गुरूकुल की प्राचीन अवधारणाएं समाप्त हो चुकी है। लेकिन आधुनिक स्वरूप में स्कूल नाम से इसका अस्तित्व है, आज बच्चों के विकास के लिए बड़ी संख्या में हर समाज व समुदाय में स्कूल स्थापित है। स्कूल व्यवस्था मुख्यतः दो रूपों में विभाजित है-प्रायवेट और सरकारी स्कूलों के रूप में। विकीपीडिया के अनुसार, करीब 29 प्रतिशत भारतीय बच्चें प्रायवेट स्कूल से शिक्षा प्राप्त करते हैं। दोनों तरह के स्कूल सरकारी व प्रायवेट स्कूल के बारे में तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि निजी स्कूल में अच्छी शिक्षा मिलती है, बच्चों को सुविधाजनक कक्षाएं, मूलभूत सुविधाएं अंग्रेजी का ज्ञान और अधिक मात्रा में प्रशिक्षित या अच्छे शिक्षक भी। निजी और सरकारी स्कूल के शिक्षक व विद्यार्थी का अनुपात में भी अंतर है, विकीपीडिया के अनुसार, प्रायवेट स्कूलों के शिक्षक व विद्यार्थी का अनुपात 1रू31है जबकि सरकारी स्कूलों में शिक्षक व विद्यार्थी का अनुपात 1रू37 है। महिला शिक्षक भी प्रायवेट स्कूलों में ज्यादा है जबकि सरकारी स्कूलों में उसकी तुलना में कम। विश्व बैंक के अनुसार, सन 2000 में प्रायमरी सेक्शन में महिला शिक्षक का प्रतिशत 35.6 रहा जबकि सेकेन्ड्री सेक्शन में महिला शिक्षक 34.3 प्रतिशत रही।
एक बड़ा वास्तविक अंतर प्रायवेट स्कूल और सरकारी स्कूल में यह है कि प्रायवेट स्कूल में वही अपने बच्चें को पढ़ा सकते हैं जिनके पास अधिक पैसा हो जबकि सरकारी स्कूल सरकार द्वारा संचालित है और निःशुल्क कर दिया है, इस स्कूल में अमीर ही नहीं गरीब भी बच्चों को पढ़ा सकते हैं। पर शिक्षक चाहे सरकारी स्कूल की ही क्यों ना हो, शिक्षक ही वह रचयिता है जो बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर व सही दिशा दिखाकर उसे कीचड़ में भी कमल के तरह खिलने का मंत्र बता सकते है।
वैसे सरकारी स्कूल व शिक्षकों पर अधिक भार है, अभी भी 69 प्रतिशत बच्चें यही से पढ़कर आते हैं या यही शिक्षा प्राप्त करते हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद से अधिक से अधिक बच्चों का नामांकन कराना व उसे उचित शिक्षा प्रदान करना शिक्षकों के महŸवपूर्ण जिम्मेदारी में शामिल हो गया है। मेंटिनेन्स मांगते स्कूल भवन, टूटे-फूटे बेंच, या उसका कम होना, लड़की बच्ची के लिए शौचालय की असुविधा आदि की कमी की वजह से हमारे शिक्षक भी प्रभावित होते हैं पर बेहतर शिक्षा व विद्यार्थी का रिजल्ट अच्छा हो व वे सफल जीवन बिताए, इसकी तमन्ना चाहे सरकारी स्कूल के शिक्षक हो या प्रायवेट स्कूल के, दोनों के मन में इसकी समान भावनाएं होती है या हो सकती है। मेरा मानना है कि बेशक मूलभूत सुविधाएं बच्चों को निजी स्कूलों में बेहतर मिलती हो पर अच्छा शिक्षक मिलना तो सौभाग्यशाली होने के समान है, यह बच्चा को किसी भी स्कूल में मिल सकता है और जिन्हें अच्छे गुरू की कृपा मिल जाये, उनका जीवन सार्थक हो जाता है।
बच्चे परिवार के लोगों के बाद अपने शिक्षक से बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं, उनके पढ़ाने का तरीका, उनके प्यार या प्रोत्साहित करने का तरीका व उनका गुस्सा, सब चीजों का प्रभाव बच्चें के ऊपर पड़ता है। अगर किसी विद्यार्थी को कोई शिक्षक अधिक प्यार करते हैं तो वह विद्यार्थी अपने उस प्रिय शिक्षक का स्नेह हमेशा पाने हेतु उनके विषय का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करता है व उनकी कक्षा में ठीक व्यवहार रखता है व भविष्य में भी उनके जैसा बनने की कोशिश करता है जबकि अधिक डांटने वाले शिक्षक से बच्चें बहुत डरते हैं व घबराहट में या उनको नहीं पसंद नहीं किए जाने के कारण उनके द्वारा पढ़ाए गए विषय में बहुत अच्छा बच्चों का प्रजेंटेशन नहीं होता।
इस संदर्भ में मैंने कुछ स्कूल के बच्चों से बात की और उनका अध्ययन और शिक्षक के बारे में विचार जानना चाहा। एक विद्यार्थी ने अपने मैथ के शिक्षक के बारे में शिकायत करते हुए बताया कि इससे पहले जो मैथ की टीचर थी, वह अच्छे से व बहुत समझाकर पढ़ाती थी तो हमें मैथ समझ में आता था पर दूसरी टिचर के आने के बाद हमें मैथ समझ में नहीं आ रहा, उनका पढाने का तरीका हम समझ ही नहीं पाते। जबकि एक साइंस की स्टुडेंट ने बताया कि हमारे शिक्षक विज्ञान को इतना समझाकर व सुरूचिपूर्ण ढंग से पढ़ाते हैं कि मुझे साइंस पढ़ने में मजा आता है और मैं आगे चलकर साइंस ही रखना चाहूंगी। इसी तरह कोई और विद्यार्थी कला और मोरल साइंस के शिक्षक की तारीफ की। कुछ अन्य विद्यार्थियों ने अपने पसंदीदा टीचर की तारीफ की और उनके विषय में पढ़ाई में मन लगने की बात की। एक विद्यार्थी ने दूर से कोई चीज उठाकर मारने वाले टीचर से डरने की बात की और इसीलिए उनका काम कैसे भी पूरा करने की बात की। जबकि एक अन्य विद्यार्थी ने अपने क्लास टीचर की तारीफ की और कहा कि हमारे शिक्षक हम सभी बच्चों का बहुत ध्यान रखते हैं और हमारी बेहतरी के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं।
बच्चे शिक्षक द्वारा पढाए गए विषय पर ही केंद्रित नहीं होता बल्कि पढ़ाई के दौरान उनके व्यवहार को भी गौर से देखता है, एक बच्चा अपने शिक्षक के बारे में बताया कि उसके एक शिक्षक जब बच्चों को डांटते हैं तो अपना दांत बाहर निकाल लेते हैं और मुंह बनाकर बात करते हैं, किसी और लड़की का अपने शिक्षिका के बारे में कहना था कि मेरी वह मैडम एक दोहे को अपने हर कक्षा में दोहराती है, वो दोहा इतना सुन-सुन कर पक चुकी हूं कि वो अच्छे तरह से याद हो गया है और कब वह दोहा मैडम बोलेगी, हमें पहले से ही पता होता है। वैसे कहने को तो कहा जाता है कि विद्यार्थी का अपने शिक्षक के लिए श्रद्धा वाला भाव होना चाहिए, पर हमेशा ऐसा नहीं हो पाता। आज कल के विद्यार्थी या तो टिचर को श्रद्धा के दृष्टिकोण से देखते हैं या उस लायक ना लगे टीचर तो मजाक के दृष्टिकोण से या अपने एक दोस्त की नजर से, एक विद्यार्थी कह रही थी कि मेरी एक मैडम को पढ़ाते वक्त आंख मारने की आदत है, वैसे मैंने हंसकर कहा कि तुम्हें डरने की क्या जरूरत, कोई जेन्टस टीचर थोड़े ही है जो तुम्हें डरने की जरूरत हो।
इसी संदर्भ में मुझे भी अपने एक टीचर का एक संदर्भ याद आ रहा, हमारी एक सहपाठिन ने एक यंग टीचर से शिकायत की थी कि मास्टर साहब, हमें कोई लड़का घूर रहा पर हमारे वह स्मार्ट शिक्षक उस लड़के का पक्ष लिया और कहा कि अगर तुम उसके तरफ नहीं देखी तो कैसे पता चला कि वह लड़का घूर रहा। हमारे साइंस के यह शिक्षक लड़का-लड़की से जुड़े ऐसे कई अनछुए टॉपिक पर बात करते और हम विद्यार्थी उन टीचर से श्रद्धा कम पर लगाव अधिक रखते थे पर उनकी इस शिक्षा की वजह से लड़का-लड़की से जुड़े कई मुद्दे को नए दृष्टिकोण से हमें समझने का अवसर मिला।
उपरोक्त पूरे वाकये को बताने का मेन मकसद बच्चे के ऊपर शिक्षक का पड़ने वाला प्रभाव बताना था। उपरोक्त तथ्यों के माध्यम से यह भी कहा जा सकता है कि शिक्षक होना बड़ी बात नहीं, पर अच्छा शिक्षक के रूप में बच्चों का विश्वास प्राप्त करना बड़ी बात है, बड़ी बात है अपनी बातें इस तरह बच्चों तक पहुंचाना जिससे सामान्य बच्चें को भी उनकी बात आसानी से समझ आए और बच्चें के ऊपर उनका सकारात्मक असर हो। पहले भी अच्छे शिक्षक की मांग रहती थी और आज भी अच्छा, सुरुचिपूर्ण तरीके से पाठ को समझाने वाला, मिलनसार व समझदार टीचर बच्चों को पसंद आते हैं
साथ ही किसी विषय में जानकार या विद्वान होना अलग बात है, पर अपनी विद्वता का ज्ञान बच्चों को भी दे पाये यह बिल्कुल दूसरी बात। हमारे स्कूल में एक अंग्रेजी व रेखा गणित के शिक्षक थे, उनके जैसा अंग्रेजी में जानकार या विद्वान मैंने अब तक के अपने जीवन काल में नहीं देखा। हमारे वह शिक्षक हरेक लाइन को पहले अंग्रेजी में बोलते और फिर हिंदी में। न केवल पढ़ाने के दौरान बल्कि इससे इतर भी, उनके जीवन चर्या में यह प्रक्रिया शामिल थी, पता नहीं मुझे कि ऐसे अंग्रेजी में महारत टीचर हमारे बिहार के छोटे से गांव के हाई स्कूल में कैसे उपलब्ध हो पाए पर हमारे इस शिक्षक में शायद यह कमी थी कि उनके क्लास में विद्यार्थी खूब हल्ला करते थे, उनकी महान विद्वता के बाद भी वे अपनी बात शायद विद्यार्थी के मन-मुताबिक पहुंचा नहीं पाते थे। पर हां, अगर मैं अंग्रेजी की जानकार होना चाहती हूं तो अपने उस शिक्षक के तरह, आज भी हमारी ऐसी चाहत।
हमारे मैथ के टीचर हम बच्चों को नियमित मेहनत करने को प्रोत्साहित के लिए चाकू का उदाहरण दिया करते थे, वो कहते थे कि तेज चाकू को अगर छोड़ दो तो उसमें जंग लग जाती है, तेज चाकू मतलब तेज स्टुडेंट अगर वो रोज नहीं पढेंगे तो उनमें जंग लग जाएगी पर जो सामान्य स्टुडेंट है, वो रोज मेहनत करेंगे तो वो तेज स्टुडेंट से आगे निकल सकते हैं जैसे जंग लगी चाकू को रोज चमकाए जाए तो वह चमकता ही रहता है, इसीलिए रोज मेहनत करो। बचपन में सुनी गई अपने शिक्षक की यह बात आज भी मुझे याद है और यह इतना प्रेरणाप्रद लगा कि ये बात मैंने अपने बच्चों से भी रोज मेहनत करने को उत्साहित रखने के लिए बच्चों को भी बताया।
हमारे हिंदी के टीचर हमें बहुत मानते थे, शायद इसलिए हम हिंदी में खूब मेहनत करते थे, फलस्वरूप मुझे इस विषय में अच्छे नम्बर भी आते थे। इसे संयोग कहा जा सकता है या उनका प्रोत्साहन पर आज कैरियर भी मेरा हिंदी की वजह से हैं। उनका अपने प्रति विशेष अपनापन देखकर मुझे फील होता था कि उन्हें मुझ पर बहुत विश्वास है और एक जज्बा सा पैदा होता था कि हमें अच्छा और बहुत अच्छा करना है ताकि उनका विश्वास बना रहे। ओ हम विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के लिए व जीवन में अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। आज भी जब-जब जीवन में सफलता मिलती है, हमें अपने उस शिक्षक के कहे शब्द व आशिर्वाद याद आ जाता है। ये सारी बातें सिर्फ मेरे साथ ही नहीं, अन्य विद्यार्थी भी महसूस करते होंगे और उनके ऊपर भी अपने शिक्षक का प्रभाव ताउम्र चलता है।
पढ़ाई के अलावा भी हमारे यह शिक्षक अपने बारे में बताते रहते थे, मुझे याद है, उन्होंने कहा था कि खाना मैं अपनी पत्नी से ज्यादा बढिया बनाता हूं, अलग बात कि मैं कभी-कभी बनाता हूं, इसीलिए तेल घी अधिक खर्च होता है पर पत्नी मेरी रोज यह काम करती है तो तेल-घी कम देती है, शायद इसी वजह से ऐसा होता हो। अपने शिक्षक के मुंह से सुनी बातों के बाद शायद पहली बार हमने जाना होगा कि पुरुष भी महिला के काम या खाना बनाने वाला काम में हाथ बंटा सकते है। ऐसी बहुत सी बातों का प्रभाव हम विद्यार्थियों के ऊपर पड़ता है। हो सकता है कि हमारे शिक्षक के इस तथ्य ने हमें महिला होने पर भी हीनता से उबार दिया हो व पुरुष के तरह अपना स्वतंत्र सोच रखने के लिए प्रेरित किया हो। मेरे ख्याल से अगर शिक्षक में पाठयक्रम को अच्छा समझाने का तरीका के साथ-साथ समानतावादी, सहृदय व व्यवहार कुशल हो तो उन सब चीजों का प्रभाव विद्यार्थी के जीवन पर पड़ता है, उनके सद्गुणों की वजह से न केवल बच्चो का अच्छा विकास होता है बल्कि उसमें भी ओ सद्गुण लाने की प्रेरणा बनती है, आज भी महिला की जो दोयम स्थिति बनी है, अगर शिक्षक चाहे तो उसे प्रोत्साहित कर उसे आगे बढ़ाने में सबसे अधिक भूमिका निभा सकते हैं। इसीलिए अच्छा शिक्षक न केवल देश की संपŸिा है बल्कि सबसे ज्यादा असर करने वाला व सबसे अच्छा मार्गदर्शक भी।

कुल, मिलाकर कहा जा सकता है कि शिक्षक का प्रभाव विद्यार्थी के ऊपर बहुत ज्यादा पड़ता है, विद्यार्थी उनसे न केवल अपने पाठ को समझते हैं बल्कि जीवन के पाठ भी उनसे समझते हैं और बड़े होकर उनके जैसा बनना चाहते हैं या किसी न किसी रूप में उनके शिक्षा से प्रभावित होते हैं। इसीलिए गुरू की महŸाा बहुत है। इस शिक्षक दिवस के अवसर पर हम अपने अच्छे और पसंदीदा शिक्षक को एक बार और याद करे और उनके दिए योगदान के लिए नतमस्तक हो साथ ही अपने बच्चों को भी शिक्षक के प्रति आदर करना सिखाये ताकि स्वस्थ रिश्ता विद्यार्थी और शिक्षक के बीच पनपे जिससे हमारे बच्चें के न केवल अध्ययन में फायदा होगा बल्कि भविष्य भी उसका संवरना आसान होगा। सकारात्मक ऊर्जा उसे आगे बढ़ने के लिए रास्ते बनाएगा।

महिला अधिकार अभियान के सितम्बर-2014 का संपादकीय

Monday, 11 November 2013

सोहागवती का आशिर्वाद: दुवा या बद्दुआ

-कुलीना कुमारी

लोग कहते हैं कि हमारे जीवन में दुवाओं का बड़ा असर होता है, बड़े-बुजूर्ग व अपनों का मिलने वाला आशिर्वाद हमारे जीवन की खुशियों को बढ़ाने में सहायक होते हैं। लेकिन शादीशुदा महिला को बड़े-बुजूर्ग द्वारा दिए जाने वाला ‘सोहागती रहो’ आशिर्वाद से मुझे आपŸिा है।
हिंदू धर्म में शादी के बाद से पतिवती महिला (जिनके पति जिंदा है) द्वारा बड़े-बुजूर्ग को नमण करने पर उसेे सोहागवती रहने का आशिर्वाद दिया जाता है। इसका एक अर्थ है कि महिला जब तक जीये, सोहागवती रहे अर्थात् उसका पति जिंदा रहे, जबकि इसी शब्द का दूसरा अर्थ है कि महिला पति से पहले मर जाये, तभी उसके लिए सोहागवती रहने का अर्थ फलित होगा।  यह बड़े-बुजूर्ग द्वारा दिए जाने वाला कैसा आशिर्वाद या अभिशाप है जो बड़े-बुजूर्ग को नमण किए जाने के बावजूद पति से पहले या महिला के जल्द मरने की कामना किया जाता है।
विज्ञान ने काफी तरक्की की है लेकिन अभी भी किसी का जन्म व मौत ईश्वर के हाथ में है, ( फिर दुवा या बददुआ के नाम पर महिला के मरने का कामना क्यों किया जाता  है।) यद्यपि  विज्ञान के बदौलत मनुष्य के सुख-सुविधाओं के काफी वस्तुओं का सृजन संभव हो पाया है। गैस का चुल्हा, बल्ब, पंखा, गाड़ी, मोबाइल व कम्प्यूटर तथा और भी बहुत कुछ। इन चीजों के जरिये हम अपने आवश्यक काम कम समय में निपटा पाते हैं, इससे न केवल हमारी उम्र बढ़ी है, बल्कि अपने आकांक्षाओं के पंख को अधिक तेजी से उड़ाना संभव हो पाया है। लेकिन अभी भी जो नहीं बदला है,  वो है हरेक व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन मूल्य, जीवन जीने के तरीके व जीवन की कठिनाइयों को हल करने की प्रवृŸिायां, उसके संकल्प व सपने। कुछ तथ्य बताते हैं कि जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाला व विकट परिस्थितियों में भी जीने की आकांक्षा रखने वाला व्यक्ति अधिक दिनों तक जीता है। डार्विन का प्रकृति प्रदŸा सिद्धांत के साथ-साथ कुछ देशों की जीवन प्रत्याशा की आयु अलग-अलग होने की वजह उस देश की सामाजिक, आर्थिक व मानसिक जैसे कई मुख्य तथ्यों को जिम्मेदार ठहराया गया था। इस सोच को बल प्रदान करने वाला एक अन्य तथ्य जो शायद हम सभी ने किसी न किसी को देखा होगा वह ये कि व्यक्ति का प्राण तब तक अटका रहता है, जब तक कि आंख बंद करने से पहले वह अपनी इच्छा अपने किसी खास को बता नहीं देता और उसकी इच्छा पूर्ति का उसे आश्वासन नहीं मिल जाता।
अगर स्त्री का जीवन प्रत्याशा पुरुष से अधिक है तो इसकी वजह विकट परिस्थितियों में भी उसकी जीवन जीने की ललक, अपने घर-परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाने की प्रवृŸिा, कर्Ÿाव्यपरायणता व उसकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है, अगर इन चीजों का अनुपात स्त्री की तुलना में पुरुष में कम है तो इसमें महिला की गलती नहीं है। (मेरे मायके में मेरी दादी जिंदा है लेकिन दादा को गुजरे कई दशक हो गए। ससुराल में सास जिंदा है लेकिन ससुर को भी गुजरे कई वरष हो गए। पुरुष के पहले गुजरने का एक कारण जीवन की कठिनाइयों को सामना करने की विफलता व और जीवन जीने की उनकी इच्छाशक्ति का अभाव हो सकता है, इसमें महिला की गलती नहीं हो सकती।)
वैसे जो पैदा लेता है, मरना उसका तय है, लेकिन उसके जीवन जीने के तरीके व आकांक्षाएं उसके आयु के घटाने या बढ़ाने का काम करता है, फिर महिला के सोहागवती रहने का दुवा क्यों किया जाता है अर्थात् महिला के पति से पहले मरने की दुवा। अगर सती प्रथा कायम रहती तब भी मुझे इस आशिर्वाद का मतलब नजर आता, जबकि  ऐसा अब नहीं के बराबर है। अगर सोहागवती से अर्थ पति से मिलने वाली सुख-सुविधा व ताकत से होती तो पति बनाम शादीशुदा पुरुष के नमण करने पर चिरंजीवी या सतंजीवी का आशिर्वाद नहीं मिलता, उसे भी ‘पत्नीवती रहो’ का आशिर्वाद दिया जाता। लेकिन ऐसा होता नहीं है,  एक साथ पति-पत्नी द्वारा बड़े-बुजूर्ग को नमण किए जाने पर पुरुष को दीर्घायु का आशिर्वाद मिलता है व महिला को सोहागवती के रूप में पुरुष से पहले मर जाने की बद्दुआ। ये गलत है।
यद्यपि पतिवती (जिनके पति जिंदा है) स्त्री को ये आशिर्वाद न केवल श्रेष्ट पुरुष द्वारा बल्कि बड़ी महिलाओं द्वारा भी दी जाती है। ये आशिर्वाद इस तरह जन-मानस के प्रचलन में है कि पुरुष के साथ-साथ अधिकतर स्त्रियां भी पति से पहले मरना सौभाग्य का सूचक समझती है। वैसे पुरुष का साथ पति पर निर्भर स्त्री के लिए आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है बल्कि पति  के शारीरिक सुख के साथ-साथ उसे मंसाहारी भोजन प्राप्त करने का, लाल-पीले साड़ी ग्रहण करने का व हर शुभ कार्य में भागीदार करने का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन अगर पति नालायक भी हो और वह अगर स्त्री से पहले मरता है तो स्त्री को न केवल पति के शारीरिक सुख से वंचित होना पड़ता है, बल्कि इसके साथ-साथ उसके लिए मनपसंद भोजन, पहना-ओढ़ना व शुभ कार्य में भागीदारी से भी वंचित होना पड़ता है।
शायद इन सब वजहांे से महिला खुद भी पतिवती रहने की दुवा देती है और रहना भी चाहती है।
पिछले दिनों एक बुजूर्ग महिला ने अपनी मां की मौत की कहानी बड़े गर्व के साथ सुनाई व पिता से पहले मां के गुजर जाने की वजह से अपनी मां को बड़ा सौभाग्यशाली बताया और जोर देकर बताया कि सभी स्त्री का सौभाग्य हमारी मां जैसा हो। उन्होंने बताया, ‘‘मेरे पिता लंबे समय से बीमार चल रहे थे, खुद से उठ-बैठ भी नहीं पाते थे, और मां दिन-रात उनकी सेवा किया करती थी। जब मेरे पिता को लगने लगा कि वे अब नहीं ठीक हो पाएंगे तो हाथ-पैर जातती मेरी मां से कहा कि आप मेरे से पहले मरिये क्योंकि मैं ऊपर जाऊंगा, उससे पहले आप जाकर मेरे रास्ते को झाड़-बुहाड़ कर के साफ रखेंगे। पिता द्वारा बार-बार इन बातों को बोले जाने पर शुरु में तो मां ने विरोध किया और कहा कि मैं स्वस्थ हूं और बीमार भी नहीं  हूं, मैं आपसे पहले कैसे मर सकती हूं लेकिन इन बातों के कुछ दिनों के बाद ही मेरी मां पिता को जांतते-जांतते एक दिन अचानक मर गई। मेरे पिता मां के बाद मरे।’’ उस बुजूर्ग महिला के लिए पतिवती स्त्री शौभाग्य का सूचक हो सकता है। समाज में बुजूर्ग महिला के पिता के तरह अपनी पत्नी के पहले मरने की कामना करने वाले पुरुष की भी कमी न होंगी लेकिन बीमार पुरुष द्वारा स्वस्थ स्त्री के मौत की कामना कही से भी उचित नहीं है। इस अनुचित वृŸिा को सामाजिक मुहर बनाकर दुवा बनाम बद्दुवा के रूप में बड़े-बुजूर्ग द्वारा जो पतिवती स्त्री को दिया जाता है वो हर हाल में गलत है।
आज जब स्त्री-पुरुष दोनों को ही कानूनी रूप से अपनी आयु के हिसाब से जीवन जीने का अवसर दिया जा रहा है तो सामाजिक रूप से भी दोनों को समान आशिर्वाद दिया जाना चाहिए, पुरुष को मिलने वाला आशिर्वाद के तरह दीर्घायु व खुश रहने का।
बचपन का महŸव


किसी भी व्यक्ति के जीवन में बचपन का बड़ा महŸव है। बचपन में ही  व्यक्ति के आचार-विचार व जीवन मूल्यों की स्थापना होती है। हमारा बचपन हमारे व्यक्तित्व की नींव की तरह है। अगर नींव मजबूत है अर्थात् बचपन अच्छा गुजरा है तो  व्यक्तित्व में सकारात्मकता अधिक दिखाई पड़ती है, व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी सही तरीके इस्तेमाल करता है, व देर-सबेर सही लेकिन अपनी सफलता व सुख-शांति के प्रति आश्वस्त रहता है। भारतीय भाषा में, हमारे व्यक्तित्व की इन विशेषताओं को संस्कार भी कहा जाता है, बड़ों के प्रति सम्मानजनक संबोधन, उचित भाषा का प्रयोग, समुचित तरीके से उठने-बैठने के सलीके आदि बचपन में ही सीखाए जाते है।
लेकिन अगर किसी का बचपन अच्छा गुजरे ही नहीं, और उसमें सुनहरे भविष्य बनाने के लिए सपने ही नहीं तो इससे न केवल व्यक्ति का भविष्य अंधकारमय बनता है, बल्कि वह दूसरों पर निर्भर होकर आजीवन जीता रहता है।
अधिकतर महिलाओं का बचपन नकारात्मक सोच के साथ व भेदभाव के बीच पलता है और यह नकारात्मकता उसे अपने अस्तित्व के प्रति भी हीनता पैदा करती है, यह हीनता न केवल उसमें परतंत्रता के साथ जीवन जीने के लिए मजबूर करता है, बल्कि इस बेड़ियों को तोड़ने के वह सपने देखना भी छोड़ देती है।
इस संदर्भ में मुझे एक हाथी और महावत की कथा याद आती है, जब हाथी छोटा था तो महावत उसके  मात्र एक पैर में रस्सी बांधकर नियंत्रण में कर लेता था, हाथी के बड़े होने पर भी महावत द्वारा हाथी के सिर्फ एक पैर में ही रस्सी बांधकर नियंत्रण करना आसान रहा क्योंकि हाथी उसका अभ्यस्त हो चुका था।
मनुष्य के बचपन में जैसा बीज बोया जाता है, बड़े होने पर भी उसका असर दिखता है। मनुष्य जिस परिवेश के बीच पलता है, या पाला जाता है, जैसी उससे उम्मीदें की जाती हैं या जिस तरह उसका सपना होता है, बड़े होने पर वे परिलक्षित होते हैं।
मुझे याद है, अपने बचपन की वे बातें जो मुझे सोच के स्तर पर मेरी अन्य सहेलियों से मुझे अलग करता था। मैं लड़की होने के कारण किसी हीन भावना से ग्रस्त न थी और न खुद को किसी लड़के से कमतर नहीं मानती थी, साथ ही मैं लड़का व लड़की दोनों को आगे बढ़ने के समान अवसर दिए जाने के पक्षधर थी व दोनों समान है, इस विषय पर विरोध करने वाले से बहस भी करती थी। फिर मैंने आत्मनिर्भर बनने के सपने बचपन में ही देखे थे, मुझे लगता है कि मेरे बचपन के वह सकारात्मक व समानता के सोच व इच्छाशक्ति का ही परिणाम है कि आज मैं आत्मनिर्भर हूं व मेरे समूह की अन्य सहेलियां हाऊस वाइफ बन कर जी रही है और आज भी अपने को महिला होने के कारण कोस रही है।
मुझे लगता है कि हमारे समाज में जो भी महिलाएं आत्मनिर्भर है, व घर में निर्णायक भूमिका निभाती है, उनमें से अधिकतर महिलाओं ने इस प्रकार के प्रयास बचपन से ही शुरु कर दिए होंगे और उनके अभिभावक व अपनों ने इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए उन्हें बचपन से ही प्रेरित किया होगा।
आज अगर समाज में बहुसंख्य पुरुष आर्थिक निर्भर व निर्णायक भूमिका घर-परिवार में निभाता है तो इसके बीज बचपन से ही बोए जाते हैं व इसके लिए उसे प्रेरित किया जाता है। मां-बाप लड़के को अपना वंश व बूढापे का सहारा मानते हैं तथा गुणवŸाायुक्त खान-पान, बेहतर शिक्षा, व घर तथा बाहर अपनी बात रखने का अवसर प्रदान करते हैं, इसके विपरीत बेटियों को बोझ व पराया धन कहते नहीं अघाते। और बचपन से ही लड़कियों का परवरिश इस प्रकार किया जाता है कि पुरुष राज करें और महिला घर की देखभाल और घरवालों की सेवा।
बेटियों के साथ भेदभाव करने में सिर्फ पिता बनाम पुरुष ही दोषी नहीं है, कई मामलों में देखा गया है कि मां व अन्य स्त्रियां भी इस दोष के भागीदार है। पिछले दिनों एक परिचित ने अपने कजन भाई-भाभी से मिलवाया और परोक्ष में अपने कजन भाई के बारे में बताया कि इसकी चार बहन है, इसने अपनी मां के कहने पर सबसे छोटी बहन को पोखर में डूबा रहा था लेकिन गांव वालों के देखे जाने पर वह बच गई। यद्यपि उसकी छोटी बहन की अभी तक शादी नहीं हुई लेकिन वह जॉब में हैं व आज वही घर-परिवार का खर्च चला रही है। इतने वरष के बाद भी जब उसकी अन्य रिश्तेदार महिला पर इस घटना का असर है तो जिस लड़की के साथ बचपन में ऐसी घटना घटी होंगी, वे क्या भूली होंगी, ये कैसा विभत्स सोच व मजबूरी है जिससे अपने ही दुश्मन बन जाते हैं।
हमने कुछ ऐसे स्त्री-पुरुष को भी देखा है जो मां-बाप द्वारा किए गए बचपन के दुर्व्यवहार के लिए आज तक मां-बाप को ताना देते है। अपने ही भाई-बहनों के बीच किए जाने वाले बचपन के भेदभाव को अनुचित ठहराते हैं व उनकी न्याय प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। बचपन में झेले गए उन यंत्रणा के पल से वे आज भी अपने को चोटिल महसूस करते हैं व मां-बाप के प्रति अविश्वास से उन्हंे दूसरों के साथ मधुर रिश्ता बनाने में कठिनाइयां होती है।
इसी संबंध में कुछ ने अपनी अच्छी परवरिश के लिए मां की भूमिका को सराहा और बताया कि उसकी शिक्षा-दिक्षा व बेहतर परवरिश मां की वजह से संभव हुआ व मां व बच्चों के प्रति पिता द्वारा किए जाने वाले दुर्व्यवहार से आज भी क्षुब्ध है व पिता को दोषी मानते हैं। जबकि कुछ अन्य ने मां से बेहतर पिता की भूमिका को सराहा।
लोग बड़े हो जाते हैं लेकिन बचपन सभी के लिए खास होता है व बचपन में बिताए अच्छे या बुरे पल का प्रभाव व्यक्तित्व में विशेषताएं या विकृतियां पैदा कर सकती हैं। इसलिए हम बड़े को चाहिए कि हम अपने बचपन में वापस नहीं जा सकते लेकिन अपने बच्चे को बचपन में अच्छा माहौल प्रदान करें व उसे आत्मनिर्भर व जीवन की नई ऊंचाइयां छूने के लिए प्रेरित करें ताकि बड़े होकर वह सफल व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान बना सकें।