Sunday, 14 September 2014

शिक्षक की महत्ता

-कुलीना कुमारी


सितम्बर महीना शिक्षक दिवस के लिए खास है। शिक्षक दिवस में हम शिक्षक की महŸाा पर एक बार और चर्चा करते हैं और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जताते हैं। पर शिक्षक की महŸाा किसी एक दिन या महीने तक ही सीमित नहीं, ये तो हमेशा के लिए महŸवपूर्ण है। वैसे शिक्षक दिवस हर वर्ष 5 सितम्बर को अपने देश व विशेषकर स्कूलों में शिक्षक व गुरू की महŸाा के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन हमारे प्रथम उपराष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था पर उनकी कैरियर की शुरूआत एक शिक्षक के रूप में हुई और वह एक अच्छे शिक्षक के रूप में जाने गये। हमारे ख्याल से हर पद से बड़ा गुरू का पद है, गुरू को तो मां-बाप से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। इस संदर्भ में किसी लोककवि ने लिखा है कि ‘गुरू गोबिन्द दोऊ खड़े काको लागू पांव। बलिहारी गुरू आपनी गोबिन्द दिओ चिन्हाय।।’ सही में गुरू इस सम्मान के लायक है, मां-बाप तो बच्चों को जन्म देते हैं मगर गुरू जीवन निर्बहन कैसे किया जाये, उसे शिक्षित कर न केवल उसके लिए आर्थिक आधार तैयार करते हैं बल्कि जीवन जीने का तरीका भी सिखाते हैैं।
कालांतर से विद्यार्थी और शिक्षक का रिश्ता या गुरू या शिष्य/शिष्या का रिश्ता बहुत खास रहा है, विद्यार्थी को दिशा देने में शिक्षक का योगदान अकल्पनीय रहा है। न केवल एक शिक्षार्थी के रूप में हम अपने शिक्षक से पाठ्यक्रमों से अवगत होते हैं,  बल्कि हमारे जीवन के सोच, जटिलताओं को झेलने का तरीका, हमारी नैतिकता व आगे बढ़ने की दिशाएं आदि का भी प्रभाव शिक्षक का हमारे ऊपर पड़ता है। फिर बचपन में प्रायः बच्चे का मन सजीव कच्ची मिट्टी जैसे होता हैं, उसे जैसा गढ़ा जाये या उसकी शिक्षा जैसा भी हो, उसका उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है।
आज गुरूकुल की प्राचीन अवधारणाएं समाप्त हो चुकी है। लेकिन आधुनिक स्वरूप में स्कूल नाम से इसका अस्तित्व है, आज बच्चों के विकास के लिए बड़ी संख्या में हर समाज व समुदाय में स्कूल स्थापित है। स्कूल व्यवस्था मुख्यतः दो रूपों में विभाजित है-प्रायवेट और सरकारी स्कूलों के रूप में। विकीपीडिया के अनुसार, करीब 29 प्रतिशत भारतीय बच्चें प्रायवेट स्कूल से शिक्षा प्राप्त करते हैं। दोनों तरह के स्कूल सरकारी व प्रायवेट स्कूल के बारे में तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि निजी स्कूल में अच्छी शिक्षा मिलती है, बच्चों को सुविधाजनक कक्षाएं, मूलभूत सुविधाएं अंग्रेजी का ज्ञान और अधिक मात्रा में प्रशिक्षित या अच्छे शिक्षक भी। निजी और सरकारी स्कूल के शिक्षक व विद्यार्थी का अनुपात में भी अंतर है, विकीपीडिया के अनुसार, प्रायवेट स्कूलों के शिक्षक व विद्यार्थी का अनुपात 1रू31है जबकि सरकारी स्कूलों में शिक्षक व विद्यार्थी का अनुपात 1रू37 है। महिला शिक्षक भी प्रायवेट स्कूलों में ज्यादा है जबकि सरकारी स्कूलों में उसकी तुलना में कम। विश्व बैंक के अनुसार, सन 2000 में प्रायमरी सेक्शन में महिला शिक्षक का प्रतिशत 35.6 रहा जबकि सेकेन्ड्री सेक्शन में महिला शिक्षक 34.3 प्रतिशत रही।
एक बड़ा वास्तविक अंतर प्रायवेट स्कूल और सरकारी स्कूल में यह है कि प्रायवेट स्कूल में वही अपने बच्चें को पढ़ा सकते हैं जिनके पास अधिक पैसा हो जबकि सरकारी स्कूल सरकार द्वारा संचालित है और निःशुल्क कर दिया है, इस स्कूल में अमीर ही नहीं गरीब भी बच्चों को पढ़ा सकते हैं। पर शिक्षक चाहे सरकारी स्कूल की ही क्यों ना हो, शिक्षक ही वह रचयिता है जो बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर व सही दिशा दिखाकर उसे कीचड़ में भी कमल के तरह खिलने का मंत्र बता सकते है।
वैसे सरकारी स्कूल व शिक्षकों पर अधिक भार है, अभी भी 69 प्रतिशत बच्चें यही से पढ़कर आते हैं या यही शिक्षा प्राप्त करते हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद से अधिक से अधिक बच्चों का नामांकन कराना व उसे उचित शिक्षा प्रदान करना शिक्षकों के महŸवपूर्ण जिम्मेदारी में शामिल हो गया है। मेंटिनेन्स मांगते स्कूल भवन, टूटे-फूटे बेंच, या उसका कम होना, लड़की बच्ची के लिए शौचालय की असुविधा आदि की कमी की वजह से हमारे शिक्षक भी प्रभावित होते हैं पर बेहतर शिक्षा व विद्यार्थी का रिजल्ट अच्छा हो व वे सफल जीवन बिताए, इसकी तमन्ना चाहे सरकारी स्कूल के शिक्षक हो या प्रायवेट स्कूल के, दोनों के मन में इसकी समान भावनाएं होती है या हो सकती है। मेरा मानना है कि बेशक मूलभूत सुविधाएं बच्चों को निजी स्कूलों में बेहतर मिलती हो पर अच्छा शिक्षक मिलना तो सौभाग्यशाली होने के समान है, यह बच्चा को किसी भी स्कूल में मिल सकता है और जिन्हें अच्छे गुरू की कृपा मिल जाये, उनका जीवन सार्थक हो जाता है।
बच्चे परिवार के लोगों के बाद अपने शिक्षक से बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं, उनके पढ़ाने का तरीका, उनके प्यार या प्रोत्साहित करने का तरीका व उनका गुस्सा, सब चीजों का प्रभाव बच्चें के ऊपर पड़ता है। अगर किसी विद्यार्थी को कोई शिक्षक अधिक प्यार करते हैं तो वह विद्यार्थी अपने उस प्रिय शिक्षक का स्नेह हमेशा पाने हेतु उनके विषय का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करता है व उनकी कक्षा में ठीक व्यवहार रखता है व भविष्य में भी उनके जैसा बनने की कोशिश करता है जबकि अधिक डांटने वाले शिक्षक से बच्चें बहुत डरते हैं व घबराहट में या उनको नहीं पसंद नहीं किए जाने के कारण उनके द्वारा पढ़ाए गए विषय में बहुत अच्छा बच्चों का प्रजेंटेशन नहीं होता।
इस संदर्भ में मैंने कुछ स्कूल के बच्चों से बात की और उनका अध्ययन और शिक्षक के बारे में विचार जानना चाहा। एक विद्यार्थी ने अपने मैथ के शिक्षक के बारे में शिकायत करते हुए बताया कि इससे पहले जो मैथ की टीचर थी, वह अच्छे से व बहुत समझाकर पढ़ाती थी तो हमें मैथ समझ में आता था पर दूसरी टिचर के आने के बाद हमें मैथ समझ में नहीं आ रहा, उनका पढाने का तरीका हम समझ ही नहीं पाते। जबकि एक साइंस की स्टुडेंट ने बताया कि हमारे शिक्षक विज्ञान को इतना समझाकर व सुरूचिपूर्ण ढंग से पढ़ाते हैं कि मुझे साइंस पढ़ने में मजा आता है और मैं आगे चलकर साइंस ही रखना चाहूंगी। इसी तरह कोई और विद्यार्थी कला और मोरल साइंस के शिक्षक की तारीफ की। कुछ अन्य विद्यार्थियों ने अपने पसंदीदा टीचर की तारीफ की और उनके विषय में पढ़ाई में मन लगने की बात की। एक विद्यार्थी ने दूर से कोई चीज उठाकर मारने वाले टीचर से डरने की बात की और इसीलिए उनका काम कैसे भी पूरा करने की बात की। जबकि एक अन्य विद्यार्थी ने अपने क्लास टीचर की तारीफ की और कहा कि हमारे शिक्षक हम सभी बच्चों का बहुत ध्यान रखते हैं और हमारी बेहतरी के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं।
बच्चे शिक्षक द्वारा पढाए गए विषय पर ही केंद्रित नहीं होता बल्कि पढ़ाई के दौरान उनके व्यवहार को भी गौर से देखता है, एक बच्चा अपने शिक्षक के बारे में बताया कि उसके एक शिक्षक जब बच्चों को डांटते हैं तो अपना दांत बाहर निकाल लेते हैं और मुंह बनाकर बात करते हैं, किसी और लड़की का अपने शिक्षिका के बारे में कहना था कि मेरी वह मैडम एक दोहे को अपने हर कक्षा में दोहराती है, वो दोहा इतना सुन-सुन कर पक चुकी हूं कि वो अच्छे तरह से याद हो गया है और कब वह दोहा मैडम बोलेगी, हमें पहले से ही पता होता है। वैसे कहने को तो कहा जाता है कि विद्यार्थी का अपने शिक्षक के लिए श्रद्धा वाला भाव होना चाहिए, पर हमेशा ऐसा नहीं हो पाता। आज कल के विद्यार्थी या तो टिचर को श्रद्धा के दृष्टिकोण से देखते हैं या उस लायक ना लगे टीचर तो मजाक के दृष्टिकोण से या अपने एक दोस्त की नजर से, एक विद्यार्थी कह रही थी कि मेरी एक मैडम को पढ़ाते वक्त आंख मारने की आदत है, वैसे मैंने हंसकर कहा कि तुम्हें डरने की क्या जरूरत, कोई जेन्टस टीचर थोड़े ही है जो तुम्हें डरने की जरूरत हो।
इसी संदर्भ में मुझे भी अपने एक टीचर का एक संदर्भ याद आ रहा, हमारी एक सहपाठिन ने एक यंग टीचर से शिकायत की थी कि मास्टर साहब, हमें कोई लड़का घूर रहा पर हमारे वह स्मार्ट शिक्षक उस लड़के का पक्ष लिया और कहा कि अगर तुम उसके तरफ नहीं देखी तो कैसे पता चला कि वह लड़का घूर रहा। हमारे साइंस के यह शिक्षक लड़का-लड़की से जुड़े ऐसे कई अनछुए टॉपिक पर बात करते और हम विद्यार्थी उन टीचर से श्रद्धा कम पर लगाव अधिक रखते थे पर उनकी इस शिक्षा की वजह से लड़का-लड़की से जुड़े कई मुद्दे को नए दृष्टिकोण से हमें समझने का अवसर मिला।
उपरोक्त पूरे वाकये को बताने का मेन मकसद बच्चे के ऊपर शिक्षक का पड़ने वाला प्रभाव बताना था। उपरोक्त तथ्यों के माध्यम से यह भी कहा जा सकता है कि शिक्षक होना बड़ी बात नहीं, पर अच्छा शिक्षक के रूप में बच्चों का विश्वास प्राप्त करना बड़ी बात है, बड़ी बात है अपनी बातें इस तरह बच्चों तक पहुंचाना जिससे सामान्य बच्चें को भी उनकी बात आसानी से समझ आए और बच्चें के ऊपर उनका सकारात्मक असर हो। पहले भी अच्छे शिक्षक की मांग रहती थी और आज भी अच्छा, सुरुचिपूर्ण तरीके से पाठ को समझाने वाला, मिलनसार व समझदार टीचर बच्चों को पसंद आते हैं
साथ ही किसी विषय में जानकार या विद्वान होना अलग बात है, पर अपनी विद्वता का ज्ञान बच्चों को भी दे पाये यह बिल्कुल दूसरी बात। हमारे स्कूल में एक अंग्रेजी व रेखा गणित के शिक्षक थे, उनके जैसा अंग्रेजी में जानकार या विद्वान मैंने अब तक के अपने जीवन काल में नहीं देखा। हमारे वह शिक्षक हरेक लाइन को पहले अंग्रेजी में बोलते और फिर हिंदी में। न केवल पढ़ाने के दौरान बल्कि इससे इतर भी, उनके जीवन चर्या में यह प्रक्रिया शामिल थी, पता नहीं मुझे कि ऐसे अंग्रेजी में महारत टीचर हमारे बिहार के छोटे से गांव के हाई स्कूल में कैसे उपलब्ध हो पाए पर हमारे इस शिक्षक में शायद यह कमी थी कि उनके क्लास में विद्यार्थी खूब हल्ला करते थे, उनकी महान विद्वता के बाद भी वे अपनी बात शायद विद्यार्थी के मन-मुताबिक पहुंचा नहीं पाते थे। पर हां, अगर मैं अंग्रेजी की जानकार होना चाहती हूं तो अपने उस शिक्षक के तरह, आज भी हमारी ऐसी चाहत।
हमारे मैथ के टीचर हम बच्चों को नियमित मेहनत करने को प्रोत्साहित के लिए चाकू का उदाहरण दिया करते थे, वो कहते थे कि तेज चाकू को अगर छोड़ दो तो उसमें जंग लग जाती है, तेज चाकू मतलब तेज स्टुडेंट अगर वो रोज नहीं पढेंगे तो उनमें जंग लग जाएगी पर जो सामान्य स्टुडेंट है, वो रोज मेहनत करेंगे तो वो तेज स्टुडेंट से आगे निकल सकते हैं जैसे जंग लगी चाकू को रोज चमकाए जाए तो वह चमकता ही रहता है, इसीलिए रोज मेहनत करो। बचपन में सुनी गई अपने शिक्षक की यह बात आज भी मुझे याद है और यह इतना प्रेरणाप्रद लगा कि ये बात मैंने अपने बच्चों से भी रोज मेहनत करने को उत्साहित रखने के लिए बच्चों को भी बताया।
हमारे हिंदी के टीचर हमें बहुत मानते थे, शायद इसलिए हम हिंदी में खूब मेहनत करते थे, फलस्वरूप मुझे इस विषय में अच्छे नम्बर भी आते थे। इसे संयोग कहा जा सकता है या उनका प्रोत्साहन पर आज कैरियर भी मेरा हिंदी की वजह से हैं। उनका अपने प्रति विशेष अपनापन देखकर मुझे फील होता था कि उन्हें मुझ पर बहुत विश्वास है और एक जज्बा सा पैदा होता था कि हमें अच्छा और बहुत अच्छा करना है ताकि उनका विश्वास बना रहे। ओ हम विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के लिए व जीवन में अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। आज भी जब-जब जीवन में सफलता मिलती है, हमें अपने उस शिक्षक के कहे शब्द व आशिर्वाद याद आ जाता है। ये सारी बातें सिर्फ मेरे साथ ही नहीं, अन्य विद्यार्थी भी महसूस करते होंगे और उनके ऊपर भी अपने शिक्षक का प्रभाव ताउम्र चलता है।
पढ़ाई के अलावा भी हमारे यह शिक्षक अपने बारे में बताते रहते थे, मुझे याद है, उन्होंने कहा था कि खाना मैं अपनी पत्नी से ज्यादा बढिया बनाता हूं, अलग बात कि मैं कभी-कभी बनाता हूं, इसीलिए तेल घी अधिक खर्च होता है पर पत्नी मेरी रोज यह काम करती है तो तेल-घी कम देती है, शायद इसी वजह से ऐसा होता हो। अपने शिक्षक के मुंह से सुनी बातों के बाद शायद पहली बार हमने जाना होगा कि पुरुष भी महिला के काम या खाना बनाने वाला काम में हाथ बंटा सकते है। ऐसी बहुत सी बातों का प्रभाव हम विद्यार्थियों के ऊपर पड़ता है। हो सकता है कि हमारे शिक्षक के इस तथ्य ने हमें महिला होने पर भी हीनता से उबार दिया हो व पुरुष के तरह अपना स्वतंत्र सोच रखने के लिए प्रेरित किया हो। मेरे ख्याल से अगर शिक्षक में पाठयक्रम को अच्छा समझाने का तरीका के साथ-साथ समानतावादी, सहृदय व व्यवहार कुशल हो तो उन सब चीजों का प्रभाव विद्यार्थी के जीवन पर पड़ता है, उनके सद्गुणों की वजह से न केवल बच्चो का अच्छा विकास होता है बल्कि उसमें भी ओ सद्गुण लाने की प्रेरणा बनती है, आज भी महिला की जो दोयम स्थिति बनी है, अगर शिक्षक चाहे तो उसे प्रोत्साहित कर उसे आगे बढ़ाने में सबसे अधिक भूमिका निभा सकते हैं। इसीलिए अच्छा शिक्षक न केवल देश की संपŸिा है बल्कि सबसे ज्यादा असर करने वाला व सबसे अच्छा मार्गदर्शक भी।

कुल, मिलाकर कहा जा सकता है कि शिक्षक का प्रभाव विद्यार्थी के ऊपर बहुत ज्यादा पड़ता है, विद्यार्थी उनसे न केवल अपने पाठ को समझते हैं बल्कि जीवन के पाठ भी उनसे समझते हैं और बड़े होकर उनके जैसा बनना चाहते हैं या किसी न किसी रूप में उनके शिक्षा से प्रभावित होते हैं। इसीलिए गुरू की महŸाा बहुत है। इस शिक्षक दिवस के अवसर पर हम अपने अच्छे और पसंदीदा शिक्षक को एक बार और याद करे और उनके दिए योगदान के लिए नतमस्तक हो साथ ही अपने बच्चों को भी शिक्षक के प्रति आदर करना सिखाये ताकि स्वस्थ रिश्ता विद्यार्थी और शिक्षक के बीच पनपे जिससे हमारे बच्चें के न केवल अध्ययन में फायदा होगा बल्कि भविष्य भी उसका संवरना आसान होगा। सकारात्मक ऊर्जा उसे आगे बढ़ने के लिए रास्ते बनाएगा।

महिला अधिकार अभियान के सितम्बर-2014 का संपादकीय

Monday, 11 November 2013

सोहागवती का आशिर्वाद: दुवा या बद्दुआ

-कुलीना कुमारी

लोग कहते हैं कि हमारे जीवन में दुवाओं का बड़ा असर होता है, बड़े-बुजूर्ग व अपनों का मिलने वाला आशिर्वाद हमारे जीवन की खुशियों को बढ़ाने में सहायक होते हैं। लेकिन शादीशुदा महिला को बड़े-बुजूर्ग द्वारा दिए जाने वाला ‘सोहागती रहो’ आशिर्वाद से मुझे आपŸिा है।
हिंदू धर्म में शादी के बाद से पतिवती महिला (जिनके पति जिंदा है) द्वारा बड़े-बुजूर्ग को नमण करने पर उसेे सोहागवती रहने का आशिर्वाद दिया जाता है। इसका एक अर्थ है कि महिला जब तक जीये, सोहागवती रहे अर्थात् उसका पति जिंदा रहे, जबकि इसी शब्द का दूसरा अर्थ है कि महिला पति से पहले मर जाये, तभी उसके लिए सोहागवती रहने का अर्थ फलित होगा।  यह बड़े-बुजूर्ग द्वारा दिए जाने वाला कैसा आशिर्वाद या अभिशाप है जो बड़े-बुजूर्ग को नमण किए जाने के बावजूद पति से पहले या महिला के जल्द मरने की कामना किया जाता है।
विज्ञान ने काफी तरक्की की है लेकिन अभी भी किसी का जन्म व मौत ईश्वर के हाथ में है, ( फिर दुवा या बददुआ के नाम पर महिला के मरने का कामना क्यों किया जाता  है।) यद्यपि  विज्ञान के बदौलत मनुष्य के सुख-सुविधाओं के काफी वस्तुओं का सृजन संभव हो पाया है। गैस का चुल्हा, बल्ब, पंखा, गाड़ी, मोबाइल व कम्प्यूटर तथा और भी बहुत कुछ। इन चीजों के जरिये हम अपने आवश्यक काम कम समय में निपटा पाते हैं, इससे न केवल हमारी उम्र बढ़ी है, बल्कि अपने आकांक्षाओं के पंख को अधिक तेजी से उड़ाना संभव हो पाया है। लेकिन अभी भी जो नहीं बदला है,  वो है हरेक व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन मूल्य, जीवन जीने के तरीके व जीवन की कठिनाइयों को हल करने की प्रवृŸिायां, उसके संकल्प व सपने। कुछ तथ्य बताते हैं कि जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाला व विकट परिस्थितियों में भी जीने की आकांक्षा रखने वाला व्यक्ति अधिक दिनों तक जीता है। डार्विन का प्रकृति प्रदŸा सिद्धांत के साथ-साथ कुछ देशों की जीवन प्रत्याशा की आयु अलग-अलग होने की वजह उस देश की सामाजिक, आर्थिक व मानसिक जैसे कई मुख्य तथ्यों को जिम्मेदार ठहराया गया था। इस सोच को बल प्रदान करने वाला एक अन्य तथ्य जो शायद हम सभी ने किसी न किसी को देखा होगा वह ये कि व्यक्ति का प्राण तब तक अटका रहता है, जब तक कि आंख बंद करने से पहले वह अपनी इच्छा अपने किसी खास को बता नहीं देता और उसकी इच्छा पूर्ति का उसे आश्वासन नहीं मिल जाता।
अगर स्त्री का जीवन प्रत्याशा पुरुष से अधिक है तो इसकी वजह विकट परिस्थितियों में भी उसकी जीवन जीने की ललक, अपने घर-परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाने की प्रवृŸिा, कर्Ÿाव्यपरायणता व उसकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है, अगर इन चीजों का अनुपात स्त्री की तुलना में पुरुष में कम है तो इसमें महिला की गलती नहीं है। (मेरे मायके में मेरी दादी जिंदा है लेकिन दादा को गुजरे कई दशक हो गए। ससुराल में सास जिंदा है लेकिन ससुर को भी गुजरे कई वरष हो गए। पुरुष के पहले गुजरने का एक कारण जीवन की कठिनाइयों को सामना करने की विफलता व और जीवन जीने की उनकी इच्छाशक्ति का अभाव हो सकता है, इसमें महिला की गलती नहीं हो सकती।)
वैसे जो पैदा लेता है, मरना उसका तय है, लेकिन उसके जीवन जीने के तरीके व आकांक्षाएं उसके आयु के घटाने या बढ़ाने का काम करता है, फिर महिला के सोहागवती रहने का दुवा क्यों किया जाता है अर्थात् महिला के पति से पहले मरने की दुवा। अगर सती प्रथा कायम रहती तब भी मुझे इस आशिर्वाद का मतलब नजर आता, जबकि  ऐसा अब नहीं के बराबर है। अगर सोहागवती से अर्थ पति से मिलने वाली सुख-सुविधा व ताकत से होती तो पति बनाम शादीशुदा पुरुष के नमण करने पर चिरंजीवी या सतंजीवी का आशिर्वाद नहीं मिलता, उसे भी ‘पत्नीवती रहो’ का आशिर्वाद दिया जाता। लेकिन ऐसा होता नहीं है,  एक साथ पति-पत्नी द्वारा बड़े-बुजूर्ग को नमण किए जाने पर पुरुष को दीर्घायु का आशिर्वाद मिलता है व महिला को सोहागवती के रूप में पुरुष से पहले मर जाने की बद्दुआ। ये गलत है।
यद्यपि पतिवती (जिनके पति जिंदा है) स्त्री को ये आशिर्वाद न केवल श्रेष्ट पुरुष द्वारा बल्कि बड़ी महिलाओं द्वारा भी दी जाती है। ये आशिर्वाद इस तरह जन-मानस के प्रचलन में है कि पुरुष के साथ-साथ अधिकतर स्त्रियां भी पति से पहले मरना सौभाग्य का सूचक समझती है। वैसे पुरुष का साथ पति पर निर्भर स्त्री के लिए आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है बल्कि पति  के शारीरिक सुख के साथ-साथ उसे मंसाहारी भोजन प्राप्त करने का, लाल-पीले साड़ी ग्रहण करने का व हर शुभ कार्य में भागीदार करने का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन अगर पति नालायक भी हो और वह अगर स्त्री से पहले मरता है तो स्त्री को न केवल पति के शारीरिक सुख से वंचित होना पड़ता है, बल्कि इसके साथ-साथ उसके लिए मनपसंद भोजन, पहना-ओढ़ना व शुभ कार्य में भागीदारी से भी वंचित होना पड़ता है।
शायद इन सब वजहांे से महिला खुद भी पतिवती रहने की दुवा देती है और रहना भी चाहती है।
पिछले दिनों एक बुजूर्ग महिला ने अपनी मां की मौत की कहानी बड़े गर्व के साथ सुनाई व पिता से पहले मां के गुजर जाने की वजह से अपनी मां को बड़ा सौभाग्यशाली बताया और जोर देकर बताया कि सभी स्त्री का सौभाग्य हमारी मां जैसा हो। उन्होंने बताया, ‘‘मेरे पिता लंबे समय से बीमार चल रहे थे, खुद से उठ-बैठ भी नहीं पाते थे, और मां दिन-रात उनकी सेवा किया करती थी। जब मेरे पिता को लगने लगा कि वे अब नहीं ठीक हो पाएंगे तो हाथ-पैर जातती मेरी मां से कहा कि आप मेरे से पहले मरिये क्योंकि मैं ऊपर जाऊंगा, उससे पहले आप जाकर मेरे रास्ते को झाड़-बुहाड़ कर के साफ रखेंगे। पिता द्वारा बार-बार इन बातों को बोले जाने पर शुरु में तो मां ने विरोध किया और कहा कि मैं स्वस्थ हूं और बीमार भी नहीं  हूं, मैं आपसे पहले कैसे मर सकती हूं लेकिन इन बातों के कुछ दिनों के बाद ही मेरी मां पिता को जांतते-जांतते एक दिन अचानक मर गई। मेरे पिता मां के बाद मरे।’’ उस बुजूर्ग महिला के लिए पतिवती स्त्री शौभाग्य का सूचक हो सकता है। समाज में बुजूर्ग महिला के पिता के तरह अपनी पत्नी के पहले मरने की कामना करने वाले पुरुष की भी कमी न होंगी लेकिन बीमार पुरुष द्वारा स्वस्थ स्त्री के मौत की कामना कही से भी उचित नहीं है। इस अनुचित वृŸिा को सामाजिक मुहर बनाकर दुवा बनाम बद्दुवा के रूप में बड़े-बुजूर्ग द्वारा जो पतिवती स्त्री को दिया जाता है वो हर हाल में गलत है।
आज जब स्त्री-पुरुष दोनों को ही कानूनी रूप से अपनी आयु के हिसाब से जीवन जीने का अवसर दिया जा रहा है तो सामाजिक रूप से भी दोनों को समान आशिर्वाद दिया जाना चाहिए, पुरुष को मिलने वाला आशिर्वाद के तरह दीर्घायु व खुश रहने का।
बचपन का महŸव


किसी भी व्यक्ति के जीवन में बचपन का बड़ा महŸव है। बचपन में ही  व्यक्ति के आचार-विचार व जीवन मूल्यों की स्थापना होती है। हमारा बचपन हमारे व्यक्तित्व की नींव की तरह है। अगर नींव मजबूत है अर्थात् बचपन अच्छा गुजरा है तो  व्यक्तित्व में सकारात्मकता अधिक दिखाई पड़ती है, व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी सही तरीके इस्तेमाल करता है, व देर-सबेर सही लेकिन अपनी सफलता व सुख-शांति के प्रति आश्वस्त रहता है। भारतीय भाषा में, हमारे व्यक्तित्व की इन विशेषताओं को संस्कार भी कहा जाता है, बड़ों के प्रति सम्मानजनक संबोधन, उचित भाषा का प्रयोग, समुचित तरीके से उठने-बैठने के सलीके आदि बचपन में ही सीखाए जाते है।
लेकिन अगर किसी का बचपन अच्छा गुजरे ही नहीं, और उसमें सुनहरे भविष्य बनाने के लिए सपने ही नहीं तो इससे न केवल व्यक्ति का भविष्य अंधकारमय बनता है, बल्कि वह दूसरों पर निर्भर होकर आजीवन जीता रहता है।
अधिकतर महिलाओं का बचपन नकारात्मक सोच के साथ व भेदभाव के बीच पलता है और यह नकारात्मकता उसे अपने अस्तित्व के प्रति भी हीनता पैदा करती है, यह हीनता न केवल उसमें परतंत्रता के साथ जीवन जीने के लिए मजबूर करता है, बल्कि इस बेड़ियों को तोड़ने के वह सपने देखना भी छोड़ देती है।
इस संदर्भ में मुझे एक हाथी और महावत की कथा याद आती है, जब हाथी छोटा था तो महावत उसके  मात्र एक पैर में रस्सी बांधकर नियंत्रण में कर लेता था, हाथी के बड़े होने पर भी महावत द्वारा हाथी के सिर्फ एक पैर में ही रस्सी बांधकर नियंत्रण करना आसान रहा क्योंकि हाथी उसका अभ्यस्त हो चुका था।
मनुष्य के बचपन में जैसा बीज बोया जाता है, बड़े होने पर भी उसका असर दिखता है। मनुष्य जिस परिवेश के बीच पलता है, या पाला जाता है, जैसी उससे उम्मीदें की जाती हैं या जिस तरह उसका सपना होता है, बड़े होने पर वे परिलक्षित होते हैं।
मुझे याद है, अपने बचपन की वे बातें जो मुझे सोच के स्तर पर मेरी अन्य सहेलियों से मुझे अलग करता था। मैं लड़की होने के कारण किसी हीन भावना से ग्रस्त न थी और न खुद को किसी लड़के से कमतर नहीं मानती थी, साथ ही मैं लड़का व लड़की दोनों को आगे बढ़ने के समान अवसर दिए जाने के पक्षधर थी व दोनों समान है, इस विषय पर विरोध करने वाले से बहस भी करती थी। फिर मैंने आत्मनिर्भर बनने के सपने बचपन में ही देखे थे, मुझे लगता है कि मेरे बचपन के वह सकारात्मक व समानता के सोच व इच्छाशक्ति का ही परिणाम है कि आज मैं आत्मनिर्भर हूं व मेरे समूह की अन्य सहेलियां हाऊस वाइफ बन कर जी रही है और आज भी अपने को महिला होने के कारण कोस रही है।
मुझे लगता है कि हमारे समाज में जो भी महिलाएं आत्मनिर्भर है, व घर में निर्णायक भूमिका निभाती है, उनमें से अधिकतर महिलाओं ने इस प्रकार के प्रयास बचपन से ही शुरु कर दिए होंगे और उनके अभिभावक व अपनों ने इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए उन्हें बचपन से ही प्रेरित किया होगा।
आज अगर समाज में बहुसंख्य पुरुष आर्थिक निर्भर व निर्णायक भूमिका घर-परिवार में निभाता है तो इसके बीज बचपन से ही बोए जाते हैं व इसके लिए उसे प्रेरित किया जाता है। मां-बाप लड़के को अपना वंश व बूढापे का सहारा मानते हैं तथा गुणवŸाायुक्त खान-पान, बेहतर शिक्षा, व घर तथा बाहर अपनी बात रखने का अवसर प्रदान करते हैं, इसके विपरीत बेटियों को बोझ व पराया धन कहते नहीं अघाते। और बचपन से ही लड़कियों का परवरिश इस प्रकार किया जाता है कि पुरुष राज करें और महिला घर की देखभाल और घरवालों की सेवा।
बेटियों के साथ भेदभाव करने में सिर्फ पिता बनाम पुरुष ही दोषी नहीं है, कई मामलों में देखा गया है कि मां व अन्य स्त्रियां भी इस दोष के भागीदार है। पिछले दिनों एक परिचित ने अपने कजन भाई-भाभी से मिलवाया और परोक्ष में अपने कजन भाई के बारे में बताया कि इसकी चार बहन है, इसने अपनी मां के कहने पर सबसे छोटी बहन को पोखर में डूबा रहा था लेकिन गांव वालों के देखे जाने पर वह बच गई। यद्यपि उसकी छोटी बहन की अभी तक शादी नहीं हुई लेकिन वह जॉब में हैं व आज वही घर-परिवार का खर्च चला रही है। इतने वरष के बाद भी जब उसकी अन्य रिश्तेदार महिला पर इस घटना का असर है तो जिस लड़की के साथ बचपन में ऐसी घटना घटी होंगी, वे क्या भूली होंगी, ये कैसा विभत्स सोच व मजबूरी है जिससे अपने ही दुश्मन बन जाते हैं।
हमने कुछ ऐसे स्त्री-पुरुष को भी देखा है जो मां-बाप द्वारा किए गए बचपन के दुर्व्यवहार के लिए आज तक मां-बाप को ताना देते है। अपने ही भाई-बहनों के बीच किए जाने वाले बचपन के भेदभाव को अनुचित ठहराते हैं व उनकी न्याय प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। बचपन में झेले गए उन यंत्रणा के पल से वे आज भी अपने को चोटिल महसूस करते हैं व मां-बाप के प्रति अविश्वास से उन्हंे दूसरों के साथ मधुर रिश्ता बनाने में कठिनाइयां होती है।
इसी संबंध में कुछ ने अपनी अच्छी परवरिश के लिए मां की भूमिका को सराहा और बताया कि उसकी शिक्षा-दिक्षा व बेहतर परवरिश मां की वजह से संभव हुआ व मां व बच्चों के प्रति पिता द्वारा किए जाने वाले दुर्व्यवहार से आज भी क्षुब्ध है व पिता को दोषी मानते हैं। जबकि कुछ अन्य ने मां से बेहतर पिता की भूमिका को सराहा।
लोग बड़े हो जाते हैं लेकिन बचपन सभी के लिए खास होता है व बचपन में बिताए अच्छे या बुरे पल का प्रभाव व्यक्तित्व में विशेषताएं या विकृतियां पैदा कर सकती हैं। इसलिए हम बड़े को चाहिए कि हम अपने बचपन में वापस नहीं जा सकते लेकिन अपने बच्चे को बचपन में अच्छा माहौल प्रदान करें व उसे आत्मनिर्भर व जीवन की नई ऊंचाइयां छूने के लिए प्रेरित करें ताकि बड़े होकर वह सफल व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान बना सकें।

Monday, 20 May 2013

महिला उत्सव -कुलीना कुमारी



अन्य वर्ष के तरह वर्ष 2012 में भी जेंडर भेदभाव की वजह से देश भर में हजारों महिलाएं अत्याचार व असमानता की बलिवेदी पर जीने को मजबूर हुई लेकिन वर्ष के खतम होते-होते 16 दिसंबर को होने वाली दामिनी कांड ने जैसे पूरे समाज व देश को झकझोर दिया, स्त्री-पुरुष, बच्चे जैसे सभी कह उठे, अब और नहीं, अब ऐसे तो हर्गिज नहीं। अत्याचार व बलात्कार दामिनी से पहले भी और लड़कियों की हुई, उसके बाद भी हो रही है, लेकिन विरोध के स्वर बढ़ गए हैं। दामिनी का बलिदान व्यर्थ न गया, दामिनी के अभिभावक के साथ अन्य अभिभावक भी सुर में सुर मिलाकर कह उठे, जैसा दामिनी के साथ हुआ, वैसा किसी और बेटी, दूसरी बेटी के साथ न हो। जनसमूह का आक्रोश देखकर सरकार सोचने पर मजबूर हुई व न्यायमूर्त्ति वर्मा सुझाव समिति गठित की गई।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी महिलाओं के हित में कुछ मूलभूत सुधारात्मक फैसला लिए। उसके महŸवपूर्ण फैसलों मंे शामिल हैं: कोई भी अस्पताल, चाहे वह सरकारी हो या निजी, आपराधिक वारदात या किसी दुर्घटना के शिकार व्यक्ति और बलात्कार-पीड़ित को तुरंत इलाज देने से इंकार नहीं कर सकता। अदालत का कहना है कि ऐसे मामलों में प्राथमिक उपचार मुहैया कराने के साथ-साथ पीड़िता को घटनास्थल के सबसे करीबी अस्पताल में पहुंचाया जाए, ऐसी स्थिति में न क्षेत्र के बंटवारे पर उलझा जाय और न कानूनी कागजात पर, कानूनी औपचारिकताएं, पीड़ित के सामान्य स्थिति में आने के बाद पूरी की जा सकती है।
गौरतलब है कि सामूहिक बलात्कार की शिकार दामिनी को बचाया जा सकता था, अगर काफी देर तक वहां पहुंची पुलिस क्षेत्र के बंटवारे व कानूनी औपचारिकता में नहीं फंसती, जब-तब ऐसे मामले सामने आते हैं, जब डॉक्टर कानूनी औपचारिकता बिना पूरे हुए इलाज करने से मना कर देते हैं, व इस वजह से बहुत सारे लोगों की जान चली जाती है जिनको कि समय पर इलाज मिलने से बचाया जा सकता है। अर्थात उच्च न्यायालय ने दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के लिए इलाज के हक संबंधी फैसले लिए बल्कि उसके प्रचार-प्रसार पर भी जोर दे रहा है।
आपराधिक कानून में संशोधन अध्यादेश पर केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी मिलने के बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसे मंजूरी दे दी। अब बलात्कार के बाद अगर पीड़ित महिला की मौत हो जाती है तो दोषी व्यक्ति को मौत की सजा दी जा सकती है। इस अध्यादेश में बलात्कार शब्द की बजाय यौन उत्पीड़न शब्द का प्रयोग किया गया है ताकि महिलाओं के खिलाफ सभी तरह के यौन अपराधों की परिभाषा को विस्तार दिया जा सके। अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड संहिता प्रक्रिया (सीआरपीसी) और साक्ष्य अधिनियम में संशोधन का प्रावधान है। इसमें महिलाओं का पीछा करने, ताक-झांक, तेजाब फेंककर हमला करने, अभद्र भाव भंगिमा यथा शब्दों और अनुचित तरीके से स्पर्श करने को लेकर सजा बढ़ाने का प्रावधान है।
उपरोक्त कानूनी हितों के विस्तार के लिए महिला की सुरक्षा व अधिकार के लिए देशव्यापी महिला हेल्प लाइन शुरू करने की बात की गई, इस हेल्पलाइन को ऐसा बनाया जा रहा है कि देश में कही भी मुश्किल में आई महिला को पुलिस और डॉक्टर जल्द उपलब्ध हो सकें। यह हेल्पलाइन शिकायत सुनने के साथ-साथ मौके पर मदद भी पहुंचाएगी। मदद पहुंचाने के लिए जो भी धनराशि खर्च होगी, उसे महिला व बाल विकास मंत्रालय वहन करेगा। इसके अलावा उन 100 जिलों में वन स्टॉप क्राइसिस सेंटर भी खोले जाने हैं जहां महिलाओं के साथ ज्यादा अपराध होते हैं। ये सेंटर महिलाओं के इलाज के साथ-साथ बलात्कार पीड़ित और अन्य तरह से सताई गई महिलाओं की मानसिक दशा सुधारने का काम करेंगे, ऐसे सेंटर जिला अस्पतालों में खुलेंगे और सीधे जिलाधीश की निगरानी में काम करेंगे।
इस सबके बाद बात महिलाओं के लिए बजट की आती है, पिछले साल 2012-2013 में जेंडर बजट के रूप में 88,142.80 करोड़ रूपए मिले लेकिन इस वर्ष 2013-2014 में 97,234 करोड़ रूपये दिए जाने की बात की गई है।
इस वर्ष समेकित बाल विकास सेवा के लिए सरकार 17,000 करोड़ रूपये देने जा रही है, जो पूरे देश में चल रही समेकित बाल विकास सेवा योजना के 7005 केंद्रों और 13.19 लाख आंगनबाड़ियों के जरिये खर्च किया जाएगा। महापंजीयक के आंकड़े 2011 के अनुसार, भारत में अभी भी शिशु मृत्य दर प्रति हजार 44 है, रिपोर्ट 2010 के अनुसार, नवजात मृत्य दर प्रति हजार 33 है व रिपोर्ट 2007-08 के अनुसार, मातृत्य मृत्य दर एक लाख प्रति जीवित जन्मों पर 212 है, इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए सरकार महिलाओं व बच्चों का कुपोषण दूर करने पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है।
इसके अलावा देश की आधी आबादी का ध्यान रखते हुए देश में पहली बार महिलाओं के लिए अलग से सरकारी बैंक खोले जाने पर जोर दिया गया है जिसमें कर्मचारी और ग्राहक अधिकतर महिलाएं ही होंगी तथा महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्भया कोष भी स्थापित किया जाएगा। आम बजट में महिला बैंक और निर्भया कोष के लिए एक-एक हजार करोड़ रूपए का प्रावधान है। इसके अलावा एकल व विधवा महिलाओं की मजबूती के लिए महिला व बाल विकास मंत्रालय को अतिरिक्त 200 करोड़ रुपये की राशि दी जा रही है।
अतः महिला दिवस के उपलक्ष्य पर महिला उत्सव मनाने का इस बार हम महिलाओं के पास काफी कारण है। न्यायालय द्वारा इलाज के हक की बात कर न केवल पीड़ित महिलाओं को तत्काल राहत पहुंचाने की उम्मीद बढ़ गई है बल्कि आम दुर्घटनाग्रस्त जनता को भी उससे राहत मिलेगी।
महिलाओं के लिए देशव्यापी हेल्पलाइन बन जाने के बाद न केवल उसे तत्काल मदद मिल सकने की संभावना बढ़ेगी बल्कि उसके लिए एक दरवाजे बढ़ सकते हैं जो उसे तत्काल उपचार के साथ-साथ मानसिक व कानूनी सहायता मिल सकेगी। वर्तमान में महिलाओं की समस्या एक प्रमुख वजह उसके जरूरत पर रास्तों का बंद होना है, अगर महिला कुंवारी है और अगर मायके में शोषण हो तो वह किससे शिकायत करें, शाादीशुदा होने की परिस्थिति में ससुराल में समस्याएं होने पर मायके वाले प्रायः समर्थन करने को तैयार नहीं होते, अतः महिला हेल्पलाइन विवाहित व अविवाहित दोनों तरह की महिलाओं को ही सुरक्षा प्रदान कर सकने में सक्षम होगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।
महिलाओं के लिए बजट में एकल, विधवा व पिछड़ी महिलाओं के लिए सहायता व पेंशन योजना की बात की गई है जो कि बहुत ही अच्छा विचार है, ऐसे महिलाओं के आर्थिक सुदृढ़ीकरण करने से न केवल ऐसी महिलाओं की स्थिति में सुधार की गुंजाइश बढ़ेगी बल्कि जो सबसे बड़ा परिवर्तन होने की उम्मीद लगती है, वह है पति के अत्याचार सहने की मजबूरी की समाप्ति का। महिलाओं के पास अगर ये विश्वास हो जाय कि पति के बिना भी उसका व उसके बच्चे का जीवन खतम न होगा, उसे आर्थिक सुरक्षा मिलेगी तो निश्चित ही उसका आत्मबल व मजबूती बढ़ेगा, फलस्वरूप महिलाओं में सकारात्मक जीवन की दिशाएं बढ़ेंगी।
पति के जिंदा रहते उससे अलग रहने वाली महिलाओं के संदर्भ में मेरा सोचना ये है कि ऐसा वैवाहिक जीवन जिसमें पति-पत्नी के लिए एक-दूसरे के प्रति सिर्फ शिकवा-शिकायत हो, प्यार व विश्वास न हो, ऐसी परिस्थिति में महिला के लिए घुट-घुटकर जीने के बजाय तलाक एक अच्छा विकल्प है। आम बजट के जरिये अगर विधवा व एकल महिलाओं के लिए आर्थिक सुदृढ़ीकरण सुनिश्चित की जाय तो सचमुच उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन हो सकता है।
आम बजट में महिलाओं के लिए 1000 करोड़ रूपये का निर्भया फंड बनाने की घोषणा की गई है जो कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम आएंगी, साथ ही देश की आधी आबादी के लिए पहली बार महिलाओं के लिए अलग से बैंक खोले जाने का प्रस्ताव रखा गया है जिसमें कर्मचारी व ग्राहक अधिकतर महिलाएं ही होंगी।
महिलाओं के द्वारा, महिलाओं के लिए सार्वजनिक बैंक बनने से महिलाओं का एक बड़ा वर्ग के इसके ग्राहक बनने के रास्ते खुलेंगे। आज दिल्ली में जिस तरह से महिलाओं के लिए मेट्रो के लिए अलग से कोच बनाने से उस कोच में महिलाओं की बड़ी संख्या उस सफलता की सूचक है, इसकी पीछे की एक बड़ी वजह यह है कि पुरुषवर्ग भी अपने घर की महिलाओं को महिलाओं के बीच सुरक्षित महसूस करते हैं, व उसे अकेले निकलने पर भी निश्चिंता महसूस करते है, कुछ ऐसा ही महिला बैंक बन जाने से होने की उम्मीद है। पुरुष वर्ग अपनी महिलाओं को महिला बैंक का ग्राहक बनने से अधिक देर नहीं रोक पाएंगे, न इसका बहाना बना पाएंगे कि बैंक में कोई पुरुष अधिकारी छेड़खानी कर सकता है। फिर महिला बैंक अधिकारी भी अन्य बैंकों के तरह बैंक की मेंटेनेन्स के लिए व अपने को किसी भी बैंक से कमतर नहीं साबित करने के लिए जमीनी स्तर पर कार्य किया जाएगा। इसके तहत महिला कस्टमर बनाने हेतु कई योजनाएं लागू करनी होंगी ताकि न केवल एकाउंट खोलवाने हेतु महिलाएं प्रभावित हो बल्कि सामुदायिक स्तर पर उसके पुरुष वर्ग भी संतुष्ट हो और वे पत्नी अथवा महिला सदस्य का एकाउंट खोलवाने को तैयार हो।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की मजबूती में उसकी आर्थिक स्थिति का एक महŸवपूर्ण भूमिका होती है। फिर जैसे ही महिला का अपना बैंक खाता होगा तो वह उसको न केवल मेंटेन रखने का प्रयास करेगी, बल्कि ऐसे दूसरे महिला आगंतुक व उपभोक्ता से भी उसका परिचय बढेगा व उसे भी जागरूक कर व एक-दूसरे की सहायता से अन्य महिलाओं को भी जोड़ने में सहायक होगी।
फिर भी अगर बात बजट में महिलाओं को सिर्फ तात्कालिक रूप से रिझाने के उद्देश्य से की गई है तो भी सरकार को उसे पूरा करने हेतु तत्पर होना ही होगा। क्योंकि अपराधों व असमानता के खिलाफ बढ़ता महिलाओं का आक्रोश लोगांे ने देखा है जिसे देखते हुए सरकार द्वारा अधिक दिनों तक बरगलाया अथवा टाला न जा सकेगा।
इसके बावजूद, इन सभी योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू होने में समय लग सकती है, ये भी सच हो कि उन योजनाओं को सफलतापूर्वक चलाने के लिए और अधिक बजट की आवश्यकता भी हो, तो भी हम अपने बुरी स्थिति का रोना रोए, उससे अच्छा है कि जो अच्छा हमारे लिए दिख रहा है, हम उसे प्राप्त करने की कोशिश करें व उज्ज्वल भविष्य की कामना कर अपने को आशान्वित रखें।
इसी के तहत एक और बात जो तय मुझे दिख रही है वह कि महिलाओं में बढ़ता जागरूकता व उसका विस्तृत होते दायरे को पिŸाृसŸाात्मक सŸाा द्वारा अब समेटना आसान नहीं होगा।
अपनी पहचान व महŸाा के लिए स्त्रियों के साथ-साथ हमारी बेटियां भी कदम बढ़ाना शुरु कर दिया है। न केवल अपने भाइयों के साथ शिक्षा, पालन-पोषण व उŸाराधिकार सहित हर मामले में बराबरी करने के लिए तत्पर दिख रही है, बल्कि भाइयों को अधिक व उसे कम दिए जाने पर प्रश्न भी करना शुरु कर दिया है। हम बेटियों के अपनी शक्ति की पहचान के रूप में भी बढ़ते कदम के लिए भी उत्सव मना सकते हैं।
हम महिलाओं के लिए ये भी कम खुशी मनाने की बात नहीं कि बुरी स्थिति पर रोने के बजाय हम अपने कर्Ÿाव्य के साथ-साथ अधिकार के प्रति भी जागरूक हो रहे, शोषण होने पर हम आवाज उठाना सीख रहे। हम महिलाएं अपने मुश्किलों में भी खड़े रहने की उत्कंठा व आगे बढ़ने के जीजिविषा के लिए महिला उत्सव मनाए। इस महिला दिवस पर अपने साल भर की विफलता से सीखे व सफलता के लिए अपने को गौरवान्वित महसूस करें, साथ ही कसम खाएं कि दिनोनदिन जो अलख महिलाओं में जग रही है, वो बढ़ेगी बेशक, बुझेगी तो हर्गिज नहीं।  


यौनाकांक्षा और बलात्कार में संबंध --कुलीना कुमारी



पिछले महिने में घटित बलात्कार की कई घटनाएं सुर्खियों पर है, अभी तक दामिनी कांड को लेकर होने वाली चर्चाएं पूरी थमी भी नहीं थी पूर्वी दिल्ली के गांधीनगर में बलात्कार की शिकार बनी पांच साल की बच्ची के मामले ने पुनः इस विमर्श को बढ़ा दिया है कि बलात्कार बुरा है, बलात्कारी भी बुरे हैं और इस अपराध के लिए उन्हें दुर्लभतम सजा मिलनी भी चाहिए यद्यपि कम या ज्यादा सजाएं इसके लिए निर्धारित भी है, फिर भी बलात्कार रुक नहीं रहे। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, 2011 के दौरान देश भर में 24 हजार 206 मामले दर्ज किए गए जबकि 2010 में 22 हजार 172 मामले दर्ज हुए थे अर्थात इसमें बढ़त ही होती जा रही है। इतनी बड़ी संख्या में व्यक्ति क्यों आपराधिक प्रवृŸिा का होता जा रहा है, इस पर हाय-तौबा करने के बजाय क्यों न इसकी तह की पड़ताल करें।
सवाल यह है कि व्यक्ति बलात्कारी क्यों होता है, क्यों चोरी-छिपे और कभी सरेआम भी इस क्रिया को अंजाम देता है, इसके कारण ढूंढने की एक कोशिश करें व इसका कोई हल तलाशें। बलात्कार के दो मुख्य वजह होते हैं-एक तो बदला लेने के मनोविज्ञान और दूसरा यौन आवश्यकता की पूर्त्ति।
वैसे एक मामला का आपसी दुश्मनी भी है, और उसके कई कारण है, जिसमें जर, जोरू और जमीन का मुद्दा रहता है, मतलब दोस्ती-दुश्मनी अलग चीज है। लेकिन बलात्कार के प्रमुख कारणों में शामिल है-यौन आवश्यकता। जब कोई व्यक्ति उचित तरीके से इस आवश्यकता को नहीं पूरा कर पाता तब वह गलत तरीके से एक पक्षीय, आपराधिक बनाम बलत्कृत संबंध बनाता है। यही यौन संबंध अगर प्रेमी-प्रेमिका के रूप में दो पक्षीय व दोनों की सहमति से बनाया जाता तो अपराध नहीं होता।
कोई माने या न माने, यौन आवश्यकता एक ऐसी जरूरत है जिसकी कोई कितनी भी खिल्ली उड़ा ले या इस आवश्यकता से इंकार कर ले, यह हमारे मन प्राणों में बसा है, इसी की वजह से हम पैदा होते हैं और जीते जी इसे चाहे-अनचाहे हम महसूस करते हैं। जैसे हमारे लिए भोजन-पानी की आवश्यकता है वैसे ही यौन संतुष्टि हमें जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए ताकत देता है।

लेकिन कई बार कुछ लोगों को जीवन की आपाधापी में, जिसमेें वैवाहिक आय की सीमा या उसमें होने वाली रूकावट, पारिवारिक जिम्मेदारी, कैरियर संवारने या विभिन्न परिस्थितियों की वजह से पसंदीदा यौन साथी नहीं मिल पाता जिससे सहज रूप से उनकी यौन आवश्यकता की पूर्ति हो पाती, वैसे व्यक्तियों के यौन संतुष्टि हेतु ‘मास्टरवेशन’ एक महŸवपूर्ण साधन है। हमने विभिन्न स्रोतों के माध्यम से यह सुना है कि कुछ लड़के यौन संतुष्टि के लिए इस माध्यम का उपयोग करते हैं। लेकिन ऐसा छुपाकर इसीलिए प्रयोग में आता है क्योंकि स्वयं संतुष्टि के लिए इसे स्वस्थ, उचित व उपयुक्त साधन नहीं माना जाता, जबकि चिकित्सा विज्ञान के कुछ रिसर्च के मुताबिक इस प्रक्रिया से हमारे शरीर को कोई हानि नहीं होती लेकिन भ्रामकता की वजह से कि इससे भविष्य में होने वाले यौन साथी को  संतुष्ट नहीं कर पाएगा, लोग इसके उपयोग करने से डरते हैं।
ऐसा लगता है कि एक अलग कमरे में यौन संतुष्टि के लिए किया जाने वाला प्रक्रिया चाहे वह एक वैवाहिक जोड़े के बीच हो या फिर एक अकेला व्यक्ति इस प्रक्रिया को अपनाए, दोनों ही एक समान है लेकिन हमारा समाज वैवाहिक जोड़ो को यह अधिकार देता है, और तो और बच्चों को भी यह पता होता है कि मां-बाप एक कमरे में सोते हैं तो इसका क्या मतलब है। फिर हम माता-पिता अपने ऐसे वयस्क बच्चें जो शादीशुदा नहीं या फिर जिनके यौन साथी नहीं, ‘मास्टरवेशन’ के रूप में उन्हें ऐसी प्रशिक्षण क्यों न दिलाए जो उन्हें यौनिक आवश्यकता होने की स्थिति में सेल्फ सैटिकफैक्शन की ओर ले जाए।
अगर यह काम माता-पिता नहीं कर सकते तो किसी ऐसे प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करके दी जा सकती है जहां ऐसी आवश्यकता महसूस करने वाले युवा बच्चे बेहिचक अपने प्रश्न रख सके और उनके मन में उठने वाले विभिन्न सवालों के लिए उन्हें कोई डांटे नहीं, बरगलाए नहीं, ना ही पारंपरिकता व धार्मिकता के नाम पर चरित्र का ढिंढोरा पीटा जाए, जिसका पालन करना आसान न हो और बलात्कार के रूप में कही बिस्फोट हो जाए। उन्हें सेक्स एजुकेशन के अंतर्गत यह भी बताया जाना चाहिए कि दो व्यक्तियों के बीच तभी यौन संबंध बनाया जाना चाहिए जब दोनों की सहमति हो और कैसे उचित तरीके से बनाया जाय। कई विवाहित युगल का सेक्स लाइफ सुखमय नहीं होता क्योंकि कभी महिला अपने पति के यौन संबंध से संतुष्ट नहीं होती क्योंकि उसे पति द्वारा अपनाए गए तरीके पसंद नहीं होते तो कभी पति को  पत्नी के सहयोग के तरीके पसंद नहीं होते। अतः प्रशिक्षण केंद्र में यौन शिक्षा के साथ  आत्मनिर्भर होने के महŸवपूर्ण सीख दिया जाय। न केवल पढ़-लिखकर अपने कैरियर को संवार आर्थिक रूप से सक्षम बनने के लिए प्रोत्साहन के रूप में बल्कि अविवाहित होने पर या यौन साथी के अभाव में अत्यधिक यौन आवश्यकता होने पर सेल्फ सैटिस्फैक्शन के रूप में भी।
यद्यपि इन बातों के माध्यम से हमारा कहने का यह उद्देश्य नहीं कि सभी अभिभावक अपने बच्चों को बुला-बुला कर इस विषय पर बात करें, लेकिन अगर किसी स्रोत से अभिभावक यह जानते या महसूस करते हैं कि बच्चे इस विषय पर अधिक जानकारी चाहते हैं तो किसी हेल्प लाइन की तरह ऐसे प्रशिक्षण केंद्र का नंबर अभिभावक के पास होना चाहिए ताकि वह अपने बच्चों को मुहैया करा सके।  फिर जब स्कूल में मानव के कई अंगों की जानकारी व प्रक्रिया जैसे नाक का काम सूंघना, जीभ का कार्य स्वाद जैसे जानकारी दी ही जाती है तो यौनांग के बारे में जानकारी के साथ व आवश्यकता होने पर उसकी संतुष्टि की विभिन्न प्रक्रिया से क्यों अनजान रखा जाय। ऐसा लगता है कि इस प्रशिक्षण केंद्र को स्कूली शिक्षा के साथ जोड़ देना चाहिए, तनाव प्रबंधन के रूप में। क्योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2011 के दौरान मुल्क में कुल 135585 व्यक्तियों ने आत्महत्या किया है जिनमें से 47746 महिलाएं थी। आत्महत्या के कुछ मुख्य कारणों में विवाह स्थगन/न होने, तलाक अथवा यौन संबंध की विफलता, अवैध संबंध, प्रेम संबंध, नाजायज गर्भ,, कौटुम्बिक व्यभिचार, बलात्कार जैसे मामले सम्मिलित है।
यद्यपि यह सच है कि पुरुषों में जितनी तेजी से यौनेच्छा उत्पन्न होती है, व इसकी अधिकाधिक आवश्यकता होने पर वह आपराधिक सा हो जाता है और बलात्कारी तक बन जाता है, महिलाएं ऐसा नहीं करती। इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि जब पुरुष अपने विभिन्न प्रयासों के माध्यम से उचित तरीके से यौन साथी नहीं प्राप्त कर पाता तो आस-पास में दिखने या रहने वाली किसी लड़की के बलात्कार-यौन पर हमला करता है और उससे अपनी संतुष्टि पाता है। कौटुम्बिक व्यभिचार या परिचित के साथ किया जाने वाला बलात्कार इसी तरह के श्रेणी में शामिल होते हैं। बलात्कार के आंकड़े बताते हैं कि हर चार में से तीन बलात्कार विभिन्न प्रकार के रिश्तेदार व परिचित के द्वारा अंजाम दिए जाते हैं। वैसे इस संदर्भ में कुछ लोगों का कहना यह भी है कि नशा के वजह से भी व्यक्ति बलात्कार करता है जबकि दूसरी बातें नशा से जुड़ी कही जाती और सुनी जाती है कि नशा में व्यक्ति ढोंग नहीं करता, वह तो वही करता है जो चाहता है।
कुछ लोग इसे कपड़े को दोषी मानते हैं लेकिन बच्चों से लेकर बूढों तक के साथ होने बलात्कार इस दोष को झूठ साबित करता है। सच्चाई तो व्यक्तियों में पनपने वाला यौन आवश्यकता है। कालिदास से लेकर वात्सायन तक ने भी इस आवश्यकता पर अपनी कलम चलाई है। आज भी सार्वजनिक और ऐतिहासिक स्थलों पर लगाया व सजाया जाने वाला स्त्री-पुरुष के नंगी तस्वीरें व मूर्तियां क्या इसी यौन आवश्यकता के तरफ इंगित नहीं करता। यह एक ऐसे संकेत है कि एक तरफ तो भारतीयता के नाम पर धार्मिकता व परंपरा के साथ विभिन्न प्रकार के साज-सज्जा से तो लैस दिखता है, वही दूसरी तरफ वह इन सभी आडंबरों से दूर होकर मौका मिलते ही किसी चौथी दुनिया में खोना चाहता है।
यह भी कैसा मजाक है कि कौमार्य व्रत का पालन सिर्फ लड़की के लिए जरूरी माना जाता है, इस कौमार्य को किसी लड़के द्वारा खराब न कर दिया जाय, इसीलिए उसे बाहर आने-जाने से रोका-टोका जाता है। जबकि लड़के को खुली छूट दिया जाता हैं कि वह कुछ भी कर ले कोई फर्क नहीं पड़ता, उसके लिए ब्रह्मचर्य का पालन जरूरी नहीं माना जाता। पारिवारिक परंपरा के रूप में चलने वाला यही सोच लड़के को सांड़ अर्थात नियंत्रण से बाहर और लड़की को गाय अर्थात कोई भी खूंसेट लें जैसी कमजोर छवि बनाता है। लड़की को खाने-पीने, आने-जाने व शिक्षा-दीक्षा जैसी जरूरी मूल अधिकार से वंचित रखना व लड़का को अत्यधिक सुविधा व अधिकार देने से भी बलात्कार जैसे अपराध को बढ़ावा मिलता है। यहां सुविधाओं व अधिकारों के दुरुपयोग से किया जाने वाला बलात्कार को यौन आवश्यकता की वजह से किया जाने वाला बलात्कार के रूप में नहीं देखा जा सकता है। दोनों अलग चीज है।
जबकि सच यह है कि  यौन अधिकार व यौन आवश्यकता पुरुष और महिला दोनों को ही होती है। स्त्री-पुरुष न केवल एक-दूसरे के पूरक है बल्कि मानव सृजन के आधार भी। वे एक-दूजे के बिना जी नहीं सकते। सभी स्त्रियों को अपने जैसी अन्य स्त्रियों के अलावा अपने पुरुष रिश्तेदारों से भी लगाव होता है, चाहे वह पिता-भाई के रूप में हो या फिर पति-पुत्र के रूप में। पुरुष भी महिलाओं से बैर करके जी नहीं सकता, फिर जननी से बैर करना मतलब अपने मूल से कटना। अर्थात स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के साथ, एक-दूसरे के सहयोग से व एक-दूसरे के लिए जी रहे हैं तभी दुनिया कायम है।
संबंधों में सबसे मजबूत, आवश्यक व आकर्षक संबंध माना जाता है-पति-पत्नी बनाम प्रेमी-प्रेमिका के बीच पनपने वाला संबंध। यह संबंध दो वजहों से महŸवपूर्ण है। एक तो यह संबंध जन्मजात नहीं होता अर्थात लड़का-लड़की या उसके अभिभावक उसे निर्धारित करते हैं-वैवाहिक जोड़ी के रूप में। जबकि प्रेमी-प्रेमिका के रूप में व्यक्ति इसे अपनी जरूरत या पसंदगी के रूप में चुनता है। इस संबंध के महŸवपूर्ण होने के सबसे बड़ी वजह है-यह मनुष्य के यौन आवश्यकता को संतुष्ट करता है जो कि मनुष्य के जीवन का एक महŸवपूर्ण भाग है।
अगर ये सच नहीं होता तो लड़का-लड़की के बीच पनपने वाला प्रेम संबंध, अवैध संबंध नहीं बनता। उदाहरणस्वरूप ही सही विवाह से पूर्व, विवाहेŸार संबंध भी आपसी सहमति से कुछ लोगों में बनते रहे हैं, एकल महिला-पुरुष को भी यौन साथी की आवश्यकता हो सकती है। लेकिन विभिन्न परिस्थितियों की वजह से ऐसे महिला-पुरुष जिन्हें यौन साथी उपलब्ध न हो पाए, उन्हें यौन संतुष्टि के लिए दूसरा माध्यम ‘मास्टरवेशन’ के रूप में अपनाना चाहिए। यह स्वयं संतुष्टि का एक उचित हल हो सकता है। फिर अगर यह अतिरेक यौन आवश्यकता के वजह से बलात्कार के अपराध को रोक सके तो निश्चित ही समुचित समाधान के रूप मंे उभर सकता है।
यह समाधान स्त्री-पुरुष दोनों के लिए अच्छा है। बलात्कार का आरोपी किसी का महिला का भाई, पुत्र या पति हो सकता है, कोई महिला नहीं चाहेगी कि उसका रिश्तेदार ऐसा अपराध करे और इसकी सजा स्वरूप कानूनी दंड प्राप्त करें। पुरुष उचित व सही तरीके से जीने की कला सीखकर न केवल यौन अपराध से बच सकता है बल्कि यौन साथी के अभाव में भी यौन संतुष्टि प्राप्त कर स्वस्थ जीवन जी सकता है। उन महिलाओं के लिए भी यह लाभदायक हो सकती है जो अविवाहित है या फिर जिनके पति साथ नहीं है, एकल जीवन जीते हुए यौन संतुष्टि के अभाव में तनावग्रस्त होकर जी रही है, ऐसी महिलाएं ‘मास्टरबेशन’ के माध्यम से खुद को यौन संतुष्ट रख सकती है और खुशनुमा जीवन जी सकती है। सेल्फ सटिफैक्शन के माध्यम से अवैध संबंधों से भी बचा जा सकता है। इसके बारे में विभिन्न स्रोतों के जरिये लोगों में आवश्यक व स्वस्थ प्रशिक्षण के द्वारा जागरूकता बढ़ायी जा सकती है। अतः बलात्कार जैसी जघन्य समस्या के मूल में झांककर क्यों न हम एक बार इस तरफ भी पुनर्विचार करें।


























Sunday, 23 September 2012


महिला की कैसी आजादी

-कुलीना कुमारी

वर्षों से महिलाओं के साथ पितृ सŸाा द्वारा अपने फायदे के लिए उसकी भूमिकाओं का निरूपण किया गया, उसके कार्यों की रूपरेखा तय की गई, पुरुषों के हित में ही उसके चरित्र की भाषा गढ़ी गई। और तो और, जन्म से लेकर अंतिम समय तक महिलाओं को जीने की सही तरीके की व्याख्या की गई है। अफसोस इस बात की है कि आजादी के इतने साल बाद भी ये प्रक्रिया जारी है। इस प्रक्रिया ने महिलाओं का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। महिलाओं को भूमिकाओं में बांधने व पितृसŸाा द्वारा खींचे सीमांकन में जीने की मजबूरी ने उसके पैर जकड़ दिए हुए हैं। महिलाओं को जीने का अधिकार घर-परिवार की सुरक्षा के नाम पर ही दिया गया है। महिलाओं की आवाजें तभी तक लोग सुनते हैं जब तक वह घर-परिवार व पितृसŸाात्मक समाज की सुरक्षा के लिए उठती है।
अर्थात महिला घरेलू हो या कामकाजी, उसे घर, परिवार, परंपरा व समाज के बनाए नियम के अनुसार ही जीना है नहीं तो उसे चरित्रहीन अथवा डायन कहकर दंडित किया जाता है। जो महिलाएं अपनी इच्छा से जीवन जीना चाहती है, लड़कों के तरह बराबरी का अधिकार चाहती है या उसका प्रयास करती है, उसके साथ समाज व समाज में व्याप्त पितृसŸाात्मक समझ के प्रतिनिधि बहुत बुरा सलूक करते हैं। दंड भी ऐसा जो महिला विरोधी सोच व सामाजिक विभत्सता  का परिचय दें। अपने अधिकार की आवाज उठाने वाली महिला को  सार्वजनिक रूप से नंगा घुमाया जाता है, पिछले दिनों असम के गोहाटी शहर में सरेआम लोगों के समक्ष एक लड़की का कपड़े उतरवाना, व छŸाीसगढ़ के रायपुर शहर के नजदीक चार हथियारबंद लड़कों द्वारा एक प्रेमी युगल को पकड़ कर सरेआम लड़की को प्रेमी के सामने ही कपड़े उतरवाकर नंगा घूमाना जैसे कई उदाहरण है।
इतना ही नहीं अपनी इच्छा से जीने वाली लड़कियों के साथ  सार्वजनिक व सामूहिक रूप से बलात्कार तक किया जाता है अथवा लड़की को चरित्रहीन बताकर व उसकी गलतियां गिनाकर जला दिया जाता हैं। महिलाओं के संग सार्वजनिक रूप से किए जाने वाले इस अपराध के मात्र इतने उद्देश्य है कि समाज की कोई भी महिलाएं अपने लिए जीने का प्रयास न करें अन्यथा उसके साथ भी ऐसा ही सलूक किया जाएगा।
अगर इसका उद्देश्य इसके बजाय कुछ और होता तो समाज के द्वारा सार्वजनिक रूप से ये अपराध किए ही क्यों जाते, अगर महिला की सचमुच गलती होती तो उसे कानून के हवाले कर दिया जाता, कानून हाथ में लेने की जरूरत नहीं होती। चाहे सवाल महिला द्वारा चुने गए जीवनसाथी को लेकर हो अथवा घर-परिवार द्वारा बीछे गए अकर्मण्य व अपराधी के साथ रहने में आपŸिा, दोनों ही स्थितियों में सजा प्रायः महिलाओं को ही मिलती है। हमारे समाज में महिला को न्यूनतम व्यक्तिगत अधिकार से भी वंचित रखा जाता है। महिलाओं के प्रति किए जाने वाले अपराध को नेशनल क्रायम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट भी अधिक पुख्ता करती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2011 में महिलाओं के साथ दुराचार के 24206, छेड़छाड़ एवं अश्लीलता के 42,968, सताने के 8570 और अगुवा करने एवं बंधक बनाने के 35565 मामले दर्ज हुए हैं।
इस लेखनी के माध्यम से हमारा उद्देश्य महिलाओं के साथ होने वाले अपराध को मात्र दिखाना नहीं है बल्कि इसके जरिए ऐसे अपराध होते क्यों है, उसके तह तक जाने का प्रयास करना है।
बात कन्या भ्रूण हत्या से शुरू करें तो पाते हैं कि माता-पिता सिर्फ इसलिए लड़के की चाह रखते हैं कि लड़की को वंश के अधिकारी होने का अधिकार धार्मिक आडम्बरों ने नहीं दे रखा है ऐसे लिखें कि संपŸिा का अधिकार व परिवार का गौरव बनने का अधिकार नहीं है। अधिकतर लोगों का जवाब हां में होगा और इन विचारों से अपनी सहमति  भी जताएंगे, लेकिन बात इतनी ही नहीं है। उपरोक्त तीनों अधिकार अगर मां-बाप बेटी को दे दे तो भी बेटी बेटे जैसे रुतबा हासिल नहीं कर पाती, वह है हर हाल में इज्जत व प्रतिष्ठा बनाए रखने का अधिकार जो कि एक लड़की के पास नहीं नहीं होने के कई पक्ष रखें गए हैं। जीवन के विभिन्न परिस्थितियों में लड़की के साथ होने वाले छेड़छाड़ व यौन प्रताड़ना लड़की की इज्जत में बट्टा लगाता है और इसी के साथ मां-बाप के इज्जत में भी बट्टा लगती है जिसकी वजह से माता-पिता लड़की को पैदा नहीं करना चाहते।
जो लड़कियां चाहे-अनचाहे इस दुनिया में आ भी जाती है उस लड़की के विकास के प्रति नहीं बल्कि उसकी शारीरिक सुरक्षा के प्रति माता-पिता हमेशा चौंचक व सशंकित बने रहते हैं। यह सोचकर कि शादी से पहले ही हमारी लड़की के संग कोई प्यार या नफरत का खेल न खेल ले, ऐसा होने पर लड़की अपवित्र हो जाएगी। इस संदर्भ में मेरा सोचना ये है कि लड़की अपनी इज्जत प्रतिष्ठा की सुरक्षा इसीलिए नहीं रख पाती उसे किसी लड़का से कम क्षमता है बल्कि उसकी इज्जत-प्रतिष्ठा इसीलिए दांव पर लगी रहती है कि समाज के ठेकेदारों ने लड़की की इज्जत का ठीका लिया रहता है जिसके अंतर्गत किसी महिला का स्पर्श/संबंध सिर्फ उसके पति के संग हो। अन्यथा महिला की सहमति या असहमति से भी दूसरों के द्वारा बनाया जाने वाला संबंध पुरुष को नहीं महिला को पतित बना देता है। इसे दुर्विति नहीं तो क्या कहा जाय कि किसी महिला के साथ जबरदस्ती यौन संबंध बनाने वाला, किसी के साथ जबरदस्ती मुंह काला करने वाले पुरुष का शरीर व जीवन अपवित्र नहीं होता बल्कि अपवित्र महिला हो जाती है यौन प्रताड़ित महिला का तन-मन व जीवन सब।
दूसरा मामला यह है कि किसी के द्वारा किसी अन्य की संपŸिा हड़प लेने पर, किसी विशेष स्थान पर दंगा-फसाद करने पर अथवा मारपीट व खून खराबा होने पर अगर सजा कानून में चोर, आतंकवादी व खूनी के लिए नियत है तो संपŸिा से वंचित रखकर महिला के जीवन सुरक्षा को प्रति असहमति के लिए भी महिला को ही क्यों जिम्मेवार माना जा रहा है। बलात्कार की स्थिति में एक तो महिला के तन-मन पर आघात पहुंचता है। दूसरा जिस तरह के सवाल पुलिस चौकी से लेकर कोर्ट  तक उसके सामने रखें जाते है वह बलात्कार से भी कठीन और मुश्किल दर्द के दौर से महिलाओं गुजारता है। होना तो चाहिए कि ऐसी स्थिति में महिला की मदद के लिए समाज आगे आए जबकि उल्टा होता है, महिलाओं को लेकर वैचारिक दुर्भाग्य यह भी है कि महिला के पक्ष में कानून बनाने वाली उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री महिलाओं की सुरक्षा में कानून बनाने के बाद होने वाले चुनाव हार जाती हैं।
अतः ऐसी परिस्थिति में लड़की के शरीर को अपवित्र घोषित कर व उसके जीवन को कलंकित बता उसे समाज से अलग-थलग कर दिया जाता है व समाज के न्यूनतम सुविधा से भी उसे वंचित कर दिया जाता है। पिछले दिनों की एक घटना में एक छात्रा के साथ बलात्कार होने पर ग्राम पंचायत द्वारा उसके स्कूल जाने/ अन्य बच्चों के साथ पढ़ाई करने पर रोक लगा दी।
जो लड़की अपनी मरजी से अंतर्जातीय/अंतर्धार्मिक शादी करती है, उसके साथ माता-पिता अथवा समाज बहुत ही बुरा सलूक करता है। न केवल ऐसी महिलाओं को सार्वजनिक रूप से अपमान का सामना करना पड़ता है बल्कि कभी ईट-पत्थरों से तो कभी पीट-पीट कर तो कभी गोली बंदूकों से तो कभी आग के हवाले कर दिया जाता है।
अगर महिला जान बचाकर भाग पाई तो अपने जीवन सुरक्षा हेतु उसे गांव को भूलाना पड़ता है। तरह-तरह के अत्याचार समाज द्वारा अपनी मर्जी से जीने वाली महिलाओं के लिए नियत किए गए हैं।
जो लड़कियां मां-बाप व समाज के कैटेगरी में फिट दिखती है, अर्थात आंख बंद कर पितृसŸाा को स्वीकारती है, परंपरा में विश्वास करती हुई स्वयं को पति व परिवार के लिए ही समर्पित समझती है, उसका भी हश्र अच्छा नहीं। ऐसी औरतें मां-बाप द्वारा चुने लड़को के साथ ब्याह कर जीवन बसर करती है किंतु ऐसी लड़कियों को भी समाज कहां चैन से जीने देता है। परदा प्रथा, दहेज, मारपीट, अप्राकृतिक यौन संबंध झेलना व पति तथा ससुराल वाले के हिसाब से जीने को मजबूर करना महिलाएं की रोजमर्रा में जहां-तहां देखी जा सकती है। एक आंकड़े के मुताबिक करीब 50 प्रतिशत महिलाएं विभिन्न तरह की हिंसाओं की शिकार होती है। समाज का मानक वह रूप जिसमें एक महिला के लिए पति के साथ ही यौन संबंध बनाने व साथ रहने की आजादी दी गई, महिलाओं के विकास की राह में रोड़े अटकाए हुए हैं, इस एक वजह के चलते ही महिलाएं हर हाल में पति को झेलती है चाहे पति अच्छा हो या बुरा। आजीवन पति बनाम पुरुषवादी सŸाा की गुलामी स्वीकारते हुए अपना जीवन ब्यर्थ बरबाद करती है। साथ ही पीढ़ी दर पीढ़ी गुलाम महिलाओं की श्रंखला चलती रहती है।
लोग कहते हैं कि महिलाएं वैज्ञानिक कम होती है, वह इसलिए कि उसे बचपन से ही दिमाग के दरवाजे बंद रखने के लिए कहा जाता है ताकि वह बुद्धिमान न बने, कुछ नया न सोचे और न करे,   उसकी प्रसिद्धि व पहचान न हो ताकि विकल्प के अभाव में वह पुरुष की गुलामी करने के लिए मजबूर हो। महिलाओं की यौनिकता का हवाला देकर उसके पैरों में बेड़िया डाली गई है ताकि वह बेहिचक समाज को खुली आंखों से देख न सके, उसे पहचान न सके और उसमें गुम होने के डर से पुरुष की गुलामी करने को आजीवन अभिशप्त रह सकें।
वैसे एक पुरुष के लिए यौनिकता का सामाजिक रूप से कितना महŸव है? इतना ही ना कि पेट की भूख की तरह शरीर की भी भूख होती है, किसी लड़की को देखकर भूख लगी, संबंध बन गया, भूख खतम, संबंध खतम। वैसे भी मनुष्य का जीवन इसी संबंध पर आधारित है और लड़के-लड़की का एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होना प्राकृतिक है। (इस संदर्भ में पूछे जाने पर पत्नी भक्त कुछ पुरुषों का कहना है कि दोनों की सहमति से संबंध बनना तात्कालिक आवश्यकता कहा जा सकता है, अपराध नहीं और इससे किसी का चरित्र हनन नहीं होता।) तो इस प्राकृतिक संबंध का खामियाजा सामाजिक रूप से लड़की के नाम क्यों? फिर यौनिक संबंध को लेकर लड़के के समान ही लड़की का भी नजरिया क्यों न हो? एक ही समाज में रहते हुए लड़के और लड़की के लिए अलग नियम क्यों? क्यों न पितृसŸाा द्वारा महिलाओं के लिए गढ़ी इस इज्जत की परिभाषा को मानने से इंकार कर दिया जाय। महिला अपने शरीर पर किसी पुरुष व समाज की पहरेदारी क्यों करने दें। जिस दिन से महिलाएं महिला के लिए समाज द्वारा निर्धारित इज्जत की इस तथाकथित परिभाषाओं को नहीं मानेगी तो इसका हौआ बनाना भी कम हो जाएगा। (और कम हो सकता है यौन प्रताड़ना व बलात्कार का भय दिखाकर दबंग लोगों द्वारा महिलाओं पर दबाव बनाना)।
इस प्रक्रिया की एक महŸवपूर्ण कड़ी होगी-परदा प्रथा का विरोध। महिलाओं के लिए कितना परदा हो, इस संबंध में एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्Ÿाा का कहना है कि महिलाओं के लिए भी उतना ही परदा जरूरी है जितना कपड़े की आवश्यकता पुरुषों को है। पुरुष से अधिक महिला को भी अपने शरीर छुपाने की जरूरत क्यों हो? घूंघट व चेहरे तक को छुपाने के लिए मजबूर करना महिला के प्रति एक प्रकार का दबाव बनाम अपराध है जिसका किसी भी हाल में समर्थन नहीं किया जा सकता। समाज महिला को अतिरिक्त परदे में रखना उचित समझता है व उसे नंगा करना गाली। लेकिन मैं बताऊं कि किसी महिला का नंगा होना गाली नहीं हो सकता, अगर ये गाली होता तो (जीवनधारा को चलायमान रखने के लिए) कोई महिला किसी लड़का या लड़की को पैदा नहीं करती। अगर पुरुषवादी समाज सरेआम किसी महिला को नंगा करता है, तो वह उस महिला को नंगा नहीं करता, वह खुद को नंगा करता है, वह अपनी मूल/मां को बेइज्जत करता है, और अपने जड़ को काटने वाला कहां फल-फूल पाएगा। तभी तो रफ्तार बेशक धीमी हो, लेकिन इस विकृत समाज में भी महिलाएं आगे बढ़ रही है।
दूसरी जो सबसे ज्यादा महŸवपूर्ण है-वह है अपने को अभिव्यक्त करना, महिला क्या सोचती है व क्या चाहती है, इसे घर-परिवार में व्यक्त करना व अपने सपने की पूर्ति के लिए प्रयास करसंपŸिा ना। अनेकानेक प्रयास मंजिल तक पहुंचने का रास्ता सहज बना देगा।
अंततः कुछ महिलाओं ने अपने प्रयास से कदम के निशां छोड़ना शुरु कर दिया है। सचमुच नए व स्वतंत्र सोच के साथ कुछ महिलाओं ने सोचना शुरु कर दिया है, परिणाम बेशक कुछ हो, इन महिलाओं का जीवन का अंतिम लक्ष्य नए सोच व नए तरीके से जीवन जीना ही है। मुझे उम्मीद है समाज की ये गिनी-चुनी महिलाएं अन्य महिलाओं के लिए ऐसी प्रेरणा का स्रोत बनेगी जो आने वाले दिनों में नया सोच व नया राह प्रशस्त करने में सहायक होगी।

Saturday, 1 September 2012




महिलाओं के संग दोयम दर्जे सा व्यवहार

-कुलीना कुमारी

तथाकथित सरकारी महिला सशक्तिकरण के दौर में भी महिलाओं के साथ भेदभाव जारी  है। बात बेशक हो विकास की लेकिन हमारे भारतीय समाज की परिस्थिति, कानून व उसके लागू करने संबंधी प्रावधान महिलाओं के लिए उचित वातावरण नहीं बनाते। आज भी महिलाओं को दोयम दर्जे की मानवीय प्राणी के रूप में देखा जाता है। जबकि पुरुष को अधिक से अधिक सक्षम बनाने के लिए सकारात्मक वातावरण उपलब्ध है।
जी-20 सातवीं अर्थव्यवस्था सम्मेलन में भी बताया गया कि भारत महिलाओं के लिए जीने लायक सबसे खराब देश है। इसमें कहा गया कि कन्या भ्रूण हत्या, कम उम्र में शादी और पराधीनता की वजह से भारत में महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय है।
सचमुच हमारे समाज में महिलाएं जन्म से पहले से ही भेदभाव की शिकार है। द लांसेट 2011 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पिछले तीन दशकों में 1.2 करोड़ कन्या भ्रूणों की हत्या हुई है। जो बच्चियां पैदा हुई है, उसके साथ भी लड़के बच्चे के समान बराबरी का व्यवहार नहीं किया जाता, खान-पान, शिक्षा-दीक्षा व बराबरी का प्यार देने से भी गुरेज किया जाता है।
लड़कियों को कमतर माने जाने का एक अन्य दुष्परिणाम है, बच्चियों को मानव व्यापार, जिस्मफरोशी व बंधुआ मजदूरी में धकेला जाना। यद्यपि कुछ बच्चे स्वयं घर से भागते हैं लेकिन भारत में आज भी कई ऐसा समाज है जहां लड़कियांे को कमाने व काम करने के लिए शहर भेजा जाता है जबकि लड़का घर पर मां-बाप के देखभाल के लिए रहता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2008 से 2010 के बीच एक लाख से अधिक बच्चें गायब हो गए जिसमें अधिकतर बच्चियां थी। सिर्फ कर्नाटक से इन तीन सालों के दौरान 270 लड़कियां गायब हुई हैं। सेव द चिल्ड्रेन, यू के की संस्था के हेल्थ प्रोग्राम डेवलपमेंट एडवाइजर गुलशन रहमान के भी मुताबिक भारत में लड़कियों और महिलाओं की वस्तु के रूप में बिक्री जारी है। सीबीआई रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी देश में तीस लाख से ज्यादा यौनकर्मी मौजूद हैं, जो कि एक बड़ा सवाल है।
सोचनीय यह भी है कि जिस परिवार में लड़कियां रहती भी है, उसे अनेक बिंदु पर ये एहसास कराया जाता है कि तू लड़की है, इसीलिए सीमाओं में रहना सीख। एक ही परिवार की लड़की-लड़का के शिक्षण की गुणवŸाा में भी अंतर किया जाता है। जबकि लड़कियों को  भी प्राथमिक शिक्षा देने का क्रेज बढ़ा है, इसीलिए उसे-लड़कियों को सरकारी स्कूल में लड़का-बच्चा को नीजि स्कूलों में भेजा जाता है। इसके बावजूद पिछले कई सालों से दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परिक्षाओं के दोनों ही परिणामों में लड़कियां अव्वल आ रही है लेकिन इसके बाद भी उच्च शिक्षा मंे महिलाओं की पहुंच बहुत कम है।
शिक्षण के क्षेत्र में और व्यवसायिक शिक्षा में खासकर चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का अनुपात बराबर अथवा बराबर से थोड़ा अधिक देखने को मिलता है। जबकि अन्य उच्चशिक्षण व प्रशिक्षण में महिलाएं बहुत पीछे है। देश भर में आईआईटी में सिर्फ 10 प्रतिशत व आईआईएम में मात्र 20 प्रतिशत लड़कियां है। शिक्षण व डॉक्टरी के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या इसीलिए ठीक है क्योंकि ये दोनों क्षेत्र ऐसे हैं जिसे परिवार चलाते हुए चलाया जा सकता है। क्योंकि ये दोनों क्षेत्र ऐसे हैं जिसमें जॉब के अलावा प्रायवेट प्रैक्टिस की गुंजाइश रहती है जो कि अन्य क्षेत्र में इतना सहज नहीं। जबकि अन्य क्षेत्रों के प्रशिक्षण के लिए अधिक पैसा खर्च करना होगा, दूर भेजना होगा, साथ ही समय भी ज्यादा लगेगा जिसे परिवार वालों को मंजूर नहीं। अतः शिक्षण व प्रशिक्षण के स्तर पर भी महिलाओं को दोयम दर्जें का मनुष्य माना जाता है।
लड़कियों को दी जा रही परवरिश का एक बुरा पहलू यह है कि बचपन से ही उसे समझाया जाता है कि तुम्हें वही करना है जो तुम्हें तुम्हारे बड़े कहे, चाहे वो गलत हो या सही, तुम्हें अपना दिमाग इस्तेमाल नहीं करना है और उनके अनुसार ही तुम्हें चलना हैं। बड़े से तात्पर्य विभिन्न प्रकार के रिश्तेदार है, जिसमें मां-बाप, भाई व शादी के बाद पति व सास-ससुर के लिए संबोधित किए जाते हैं। लड़कियों को विभिन्न प्रकार के व्यवहार द्वारा यह भी बताया जाता है चाहे भाई या अन्य कोई पुरुष उम्र में तुमसे छोटा ही क्यों न हो लेकिन क्योंकि वह पुरुष है, इसीलिए उसे बड़ा ही समझो। मुझे आज भी वह प्रसंग याद है जब मेरे द्वारा देवर को नाम से संबोधित करने पर मेरी सास ने कहा था, यह बहुत गलत बात है, बड़का-जेठका के संतान को नाम से संबोधित नहीं करते। अधिकतर परिवारों में लड़कियांे को हुनर के रूप में सिखाया जाता है, प्राथमिक स्कूली शिक्षा, पाक कला, घर की साफ-सफाई व येस वूमैन की भूमिका।
एक तरफ समाज में लड़की के उन कार्याें का कोई मूल्य नहीं है जिस गुण के बिना कोई लड़का लड़की से शादी करने के लिए तैयार नहीं है।
दूसरी तरफ महिलाओं में इन गुणों के होने के बावजूद शादी की परिस्थिति में दहेज देने की प्रथा कायम है क्योंकि महिलाओं के घरेलू कार्य की निपुणता घरेलू कार्य में दिया जाने वाला सहयोग उसके आर्थिक क्षेत्र में किया जाने वाला सहयोग के रूप में नहीं देखा जाता, अपने चौबीस घंटे की डयूटी करने के लिए तैयार रहने के बावजूद उसे अपने ही घर में चाहे वह मां-बाप का घर हो या पति का, उसे आश्रित के रूप में ही देखा जाता है। मां-बाप स्वयं इस बेटीनुमा बोझ को दान-दहेज के साथ उपयुक्त व्यक्ति से शादी करा दूसरे घर में पहुंचा देते है फिर कभी न वापस आने के लिए। अन्य मेहमानों के तरह समय-समय पर दो-चार दिन के लिए आ जाय तो अलग बात है। यद्यपि कानूनन दहेज गैरकानूनी है, लेकिन यह सरेआम चलता है जबकि कानून में बेटियों को भी संपŸिा देने का प्रावधान है किंतु दहेज की वजह से मां-बाप द्वारा लड़की को संपŸिा से बेदखल कर दिया जाता है।
अफसोस उन आत्मनिर्भर लड़कियों व उसके अभिभावकों के लिए भी है जिनकी लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर इतना कमाती है कि स्वयं व अपने परिवार का अच्छी तरह भरण-पोषण कर सकें, इसके बावजूद उस लड़कियों के ऊपर इतना पुरुषवादी सोच हावी रहती है कि वह अपने मां-बाप व अभिभावकों के आज्ञा के बिना अपने लिए कुछ सोच नहीं पाती या फिर उन आत्मनिर्भर लड़कियों का भी मानसिक स्तर पराधीन सोच व परवरिश की वजह से गुलाम बना रहता है। एक ताजातरीन घटना में मैंने देखा है कि एक आत्मनिर्भर लड़की का मानसिक स्तर इतना निम्न व पराधीन है कि वह बेरोजगार पति की आंख बंद कर बात इसलिए मानती है क्योंकि वह पुरुष है और पुरुष की गलत बातों का भी विरोध नहीं करना चाहिए। जिस समाज में चाहे महिला घरेलू कार्य में निपुण है या अन्य बाहरी कार्य में आर्थिक रूप से सक्षम, उसे हर हाल में पुरुष के अनुसार चलने व गुलामी करने का प्रशिक्षण दिया जाय, उस समाज में महिला का विकास कैसे संभव है।
इससे बड़ा महिलाओं के खिलाफ क्या साजिश हो सकता है कि जहां महिलाएं हर तरह से सक्षम भी है वहां भी वह खुशी से पुरुषों की गलत मानने व उसकी गुलामी के लिए तैयार है। तभी तो जब-तब खबर आती है कि ससुराल वालों ने दहेज की मांग की है और मायके वाले ने उसे हर संभव देने का प्रयास किया है, जहां दहेज की मांग पूरा नहीं हो पाती वहां दुल्हन को मार दी जाती है।
राष्ट्रीय अपराध संाख्यिकी ब्यूरो-2010 के मुताबिक प्रति एक घ्ंाटे में दहेज के कारण एक दुल्हन की मौत हो जाती है। बात सिर्फ मौत की नहीं, घर-परिवार में रहने वाली जिंदा महिलाओं की स्थिति भी अच्छी नहीं है। बात चाहे पिता के घर की हो या पति के घर की, जो महिलाएं जरा सा भी अपने परिवार में मरजी चलाना चाहती है, उसके साथ बहुत दुर्व्यव्यवहार किया जाता है, उसे मारा-पीटा जाता है, घर से निकालने की धमकी दी जाती है या फिर घर से निकाल दिया जाता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा योजना आयोग द्वारा दो अलग-अलग अध्ययनों से खुलासा होता है कि 40 फीसदी से 80 फीसदी के बीच महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार है।
समाज के नीचले पायदान पर गुजर-बसर करने वाले परिवारों में भी लड़कियों की स्थिति अच्छी नहीं है, इस समुदाय में बेशक दहेज हत्याएं कम है लेकिन कच्ची उमर में शादी व कम उमर में मां बनना जैसी समस्याओं से महिलाओं को गुजरना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 50 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले कर दी जाती है। इससे महिला का पूर्ण विकास नहीं हो पाता, व कम उमर में अधिक जिम्मेदारी उठाने व मां बनने से कई स्वास्थ्य संबंधी समस्या की शिकार भी हो जाती है। ऐसी महिलाओं को जागरूक करने के बजाय  उसके स्वास्थ्य व जीवन को प्रभावित करने में सहायक है, समाज में घूम रहे यत्र-तत्र घूम रहे बिचौलिया। गरीब बीपीएल परिवार की महिलाओं के संग स्वास्थ्य लाभ के नाम पर उसके शरीर व जीवन से खेला जाता है उसका एक बड़ा उदाहरण है बिहार की 16 हजार से अधिक महिलाएं। मामला यह है कि बिचौलियों द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा राशि हड़पने के लिए ढाई वषों में 16 हजार से अधिक गरीब महिलाओं के गर्भाशय निकलवा दिए गए। सूबे में चल रही राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत बीपीएल परिवार के पांच सदस्यों के लिए अधिकतम तीस हजार रुपये की मुत इलाज की व्यवस्था है। गरीब परिवारों के इलाज के लिए सूबे में 829 निजी अस्पताल सूचीबद्ध है और यही से खेल शुरु हुआ। जिन सभी महिलाओं के गर्भाशय निकाला गया, उनकी उम्र 20 से 30 वर्ष है। अब ऐसी महिलाएं कभी भी मां नहीं बन पाएंगी।
मेरे ख्याल से स्वास्थ्य लाभ योजना का शिकार भी महिलाएं इसीलिए हुई क्योंकि इसके लिए उसे बिचौलियों से पहले उसके अपने परिवार वालों ने ही तैयार किया होगा। किसी भी पति के लिए जब उसकी पत्नी मां नहीं बनेगी तो किसी भी पुरुष के लिए ऐसी महिला को बांझ कहकर छोड़ देना अथवा दूसरी शादी करना बड़ी बात नहीं। फिर दूसरी महिला से किसी भी हद तक लाभ उठाना पुनः प्रारंभ हो जाता है।
यह महिलाओं के खिलाफ बनता वातावरण का ही दुष्परिणाम है कि जो पुरुष किसी महिला के पेट से पैदा हुआ है, और जिसका जीवन किसी महिला के साथ जीने से ही सफल है व दुनिया का अस्तित्व भी, वही पुरुष अगर महिला जाति के अस्तित्व, अस्मिता व उसके महŸव को नकारे और उसे अपने से कमतर कहते हुए शरमाए नहीं। उससे बड़ा निर्लज्ज और कौन हो सकता हैं।
अतः ये कहना अतिश्योक्ति नहीं कि परिवार, समाज व सरकारी कानून सभी महिला विरोधी है, एक और महिलाविरोधी अभियान जो कि महिला के खिलाफ जारी है, वह साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसी महिलाओं का ही महिमा मंडन करना जो पारंपरिकता में विश्वास करती है, जो महिलाएं अपने दम पर खुद को खड़ा नहीं करती बल्कि वैचारिक व व्यावहारिक स्तर पर भी अपनी मरजी से जीती है या जीने की कोशिश करती है, उन्हें चरित्रहीन, डायन व बुरा घोषित कर किसी न किसी रूप से उसका नुकसान पहंुचाने की कोशिश करना।
महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए सभी जागरूक महिलाओं व लेखिकाओं का एक पुनीत कर्Ÿाव्य है कि उन्हें जिस भी रूप में हो, महिलाओं को दोयम दर्जें के रूप में मानने से इंकार करें, खुद को सबल बनाने के साथ-साथ दूसरी महिलाओं को भी अपनी क्षमताओं के हिसाब से उन्हें मजबूत बनाने का प्रयास करें।








नारी नारी का दुश्मन नहीं, पुरुशवाद का मोहरा है

समय-समय पर नारी के विकास और उसके राहों में आने वाली रुकावटों के बारे में जब भी बात की जाती है, प्रायः दबे जुबान से यह कहा जाता है कि नारी ही नारी की दुश्मन होती है। लेकिन जब ऐसी ही बात अपने पुरूष संस्कारों से लैश होकर संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान में एक पूर्व मंत्री और सांसद डॉ. कर्ण सिंह जिन्हें यह भी जरूर पढ़ा होगा ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवताः’ इस देवता शब्द की अवधारणा अच्छाई की समझ से है-खुलेआम कहता है कि नारी ही नारी की दुश्मन होती है और यह बात सुनकर भी जब अन्य पुरुषोचित समझ के साथ बैठी नारियां (सांसद व मंत्री) भी हंसती रही अथवा समर्थन में चुप रही तो महिला अधिकार के संदर्भ में विचारणीय लगता है कि ऐसा आरोप क्यों मढ़ा जाता है। ऐसा कहने वालों की समझदारी से ज्यादा सुनने पर चुप्पी साधने की मंशा क्या है?
ऐसा कहने वाले या स्वीकार करने वाले वो लोग हो सकते हैं जो स्त्री-पुरुष के संबंध व स्त्री-स्त्री के संबंध को सिर्फ ऊपरी तौर पर देखते हो। किसी भी बयान को जारी करने से पहले कारणों की पड़ताल और कारण के मूल में जाना जरूरी है।
हां ये सच है कि लड़कियों के साथ अथवा बहुओं के साथ होने वाले भेदभाव में महिलाएं (मां-सास) पीछे नहीं आगे रहती है, घटते लिंगानुपात का महŸवपूर्ण कारण मां द्वारा कन्या शिशु को दुनिया में नहीं लाने की अनिच्छा भी शामिल है। लगभग केरल और पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर भारत वर्ष में स्त्रियों को सामाजिक-आर्थिक भागीदार के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता और सांसारिक बोझ मानने के स्वरूप स्त्री भू्रण हत्या की जाती है। लेकिन जब से विभिन्न राज्य सरकारों ने स्त्री-बच्ची को जन्म देने पर एक राशि का ईनाम देना शुरू किया है तब से स्त्री भ्रूण हत्या की दर में घटौती आई है।
वैसे पुरूषवाद की विडंबना है कि उस नये रास्तों से लड़ने के रास्ते भी निकाल लिए जाते है जो विकास के लिए अवरोधक तत्त्व विकसित करता है। संभवतः विकास के बीचाक्षर ‘क’ को ‘न‘ में बदलने की भूमिका अहम हो जाती है। राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार जबसे बनी है, तब से गर्भपात की संख्या घटी है, लेकिन गर्भ में कन्या शिशु हत्या के बजाय जन्म देकर बच्ची के जन्म से जुड़े प्रोत्साहन राशि लेकर मारने की प्रथा चली है और ग्राम पंचायत भी इसमें सहयोगी बना हुआ है, जहां महिला आरक्षण है।
कई बार जबरदस्ती लेकिन कन्या भ्रूण हत्या उसकी मां की जानकारी में की जाती है।  ऐसी महिलाएं समाज में आसानी से व खुलेआम कहती हुई मिल जाती है कि अगर उनकी एक या दो बेटियां है तो दूसरी या तीसरी संतान लड़का ही चाहिए। इसके अलावा दुनिया में आए बेटा-बेटी के खान-पान, शिक्षा-दीक्षा व संस्कार में भी परिवर्तन किए जाते हैं और उस कार्य में पूरी भागीदार महिला दिखाई देती है। अर्थात लड़का-लड़की दोनों के लिए जो समाज ने अलग-अलग पैमाना निर्धारित किया है, उसको उसी रूप में चलाने के लिए महिलाएं ही आगे दिखाई पड़ती है। ये तो महिलाओं के द्वारा महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण का बाहरी पक्ष हुआ।
इसका आंतरिक पक्ष बिल्कुल उलट है। एक लड़की को पुरुषवादी व्यवस्था में जन्म से पहले ही लड़की होने के प्रति सामाजिक व पारिवारिक दुर्भावना का सामना करना पड़ता है, जैसा कि माना जाता है कि घटते लिंगानुपात इसी दुर्भावना का परिणाम है। इसका जो दूसरा विद्रुप परिणाम दिखता है, वो है महिला को पुरुष के गुलाम के रूप में तैयार करना क्योंकि पुरुषवादी व्यवस्था तभी कायम रह सकती है जब महिला खुद को कमतर और पुरुष को महान समझे।
इस गुलामी की प्रक्रिया के अंतर्गत एक परंपरा सी बनी हुई है या व्यावहारिक रूप में ये ग्रहण कर चुकी है कि महिला चाहे घरेलू हो या कामकाजी, घर व बच्चों की देखभाल और बच्चों को जीने का तरीका बनाम संस्कार देने की जिम्मेदारी मां की है। इसकी एक वजह ये हो सकती है कि विवाह के बाद दूसरे परिवेश से आई लड़की भी ऐसा कार्य करते हुए अपने घर-परिवार के लोगों को देखा होगा तो यह कार्य करना उसके लिए नया नहीं आसान होगा, ऐसा माना जाता है। इसका दूसरा पहलू यह है कि शादी किसी भी महिला के लिए बंधन मानी जाती है जिसमें उसका घरेलू देखभाल, पति व बच्चें शामिल होते हैं। इस संबंध में तीसरा महŸवपूर्ण पहलू है कि स्त्री में ‘‘ऑबजर्वेशन’’ की क्षमता, कार्य के प्रति निष्ठा व सहनशीलता अधिक होती है। फिर बच्चे सबसे अधिक मां से प्रभावित होते हैं और बच्चों को शुरुआती उमर में अच्छे देखभाल की आवश्यकता होती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि घर व बच्चंे की देखभाल की जिम्मेदारी पूरे चौबीसों घंटे की होती है जो कि पुरुष नहीं कर सकता या नहीं करना चाहता, ऐसे में इन कार्यों के लिए महिला  से बढ़िया कोई और विकल्प नहीं होता।
महिला को बार-बार यह बताने की कि घर में स्त्री की क्या औकात होनी चाहिए। पुरुष वर्चस्व में दबी महिलाओं के संबंध में एक बात साफ है कि वह पति पत्नी को सामाजिक सच की जानकारी देता है। वह पत्नी या घर में स्थित महिलाओं को इसी हिसाब से जीने का आदेश देता है। जो भी इस आदेश बनाम सीमा को लांघने का प्रयास करती है। उसे सामाजिक सरोकारों से वंचित कर गैर सामाजिक प्राणी बताने के मुहिम चलाए जाते है।
महिला बचपन से ही जुल्म सहतेे-सहते थक हार कर कब जुल्म सहने की अभ्यस्त हो जाती है, यह कब उसके जीवन जीने के तरीके में कब शामिल हो जाता है, उसे पता नहीं चलता। इस पारिवारिक व सामाजिक महिला विरोधी आग में घी डालने का काम करता है हमारा महिला विरोधी कानून व उस कानून को पालने की लंबी व ऊबाई प्रक्रिया।
पैतृक संपŸिा में पुरुष का हिस्सा सामान्य व आधिकारिक रूप से प्रयोग में है लेकिन संपŸिा में कानूनन लड़की का हिस्सा सर्वोच्च न्यायालय ने नियत कर दिया है लेकिन अभी तक प्रचलन में नहीं आया है। इसीलिए पैतृक संपŸिा में बेटी को हिस्सा नहीं मिलता, जहां एक-आध लड़कियां पैतृक संपŸिा में हिस्सा के लिए पहल भी करती है वा करना चाहती है, वहां कानूनी प्रक्रिया इतनी कठिन व लंबी है कि नाममात्र लड़कियां ही ये अधिकार प्राप्त कर पाती है। उपयुक्त तो ये होता कि कानून की अनुपालन की प्रक्रिया हेतु तेजी लाई जाती जबकि विधायी तौर पर इसके उलट महिला को बोझ बनाए जाने की प्रक्रिया में ही तेजी की योजना है।
पिछले दिनों ये खबर आई थी कि पति-पत्नी के बीच तलाक या अलगाव के दौरान दहेज की लिस्ट बनाना व उसे प्रमाणित करना मुश्किल होता है, अतः शादी के समय ही उसका पंजीकरण कर दी जाय। पंजीकरण इस लिहाज से अच्छा है कि दहेज की लिस्टिंग को लेकर जो कानूनी प्रक्रिया लंबी खिंचती है, वह अवधि कम हो जाएगी। लेकिन कानूनन दहेज को लेकर पंजीबद्ध संबंधी प्रयास यह बताता है कि दहेज जायज है व शादी में दहेज दी जानी चाहिए।
जब दहेज के लिए ये कहा जाता है कि दहेज देना व लेना दोनों अपराध है तो इस संबंध में क्यों पहल किया जा रहा है। दहेज से महिलाओं को कोई मजबूती नहीं मिलती, तलाक के समय बेशक इस दहेज की लिस्टिंग के आधार पर एक छोटे-बड़े अमांउंट पति के तरफ से मिल जाय लेकिन पति के साथ रहते हुए वह इसकी हिस्सेदार ना के बराबर होती है। दहेज के रूप में कैश, ज्वैलरी व कुछ दैनिक उपयोग के सामान दिए जाते हैं, कैश लड़की को नहीं लड़का को दिया जाता है और बाकी लड़की को दिए जाने वाले ज्वैलरी पर भी उसके पति व ससुराल वाले का ही हक होता है, बचा दैनिक उपयोग के सामान जिसका पूराना होने पर मूल्य नहीं के बराबर है।
ऐसे में उचित ये है कि पहल महिला के हक व मजबूती के लिए किया जाना चाहिए। वो इस तरह कि पैतृक संपŸिा में लड़की के लिए जो कानूनन हिस्सा तय किया गया है व शादी के समय या इससे पहले ही लड़की के नाम कर दिया जाय व इसका पंजीकरण कराना माता-पिता के द्वारा अनिवार्य कर  दिया जाय। ऐसा होने से दो फायदा होगा, दहेज का चक्कर खतम हो जाएगा, जैसे अभी लड़के की औकात उसके माता-पिता की संपŸिा से आंकी जाती है व इसीलिए उससे दहेज नहीं मांगा जाता बल्कि उसके संपŸिा व नौकरी के आधार पर ही लड़की के अभिभावक द्वारा दहेज ऑफर किए जाते हैं, जैसे ही लड़के के तरह ही लड़की संपŸिा की अधिकारी होगी, दहेज का तांडव बंद हो जाएगा, व इसी के साथ बंद हो जाएगी दहेज से होने वाली हिंसाएं व हत्याएं।
दूसरा बेटा को लेकर वंश परंपरा चली आ रही है जिसकी वजह से भी लड़की के साथ भेदभाव किया जाता है, कन्या भ्रूण हत्या जारी है व जो जिंदा भी है, उसे गुलाम बनाने की प्रक्रिया जारी है। लड़की को भी बराबर का अधिकारी बनाने से महिला संबंधी होने वाले कई अपराध जिसमें शिशु हत्या, भेदभाव, गुलामी व दहेज समस्याएं शामिल है, इन समस्याओं से निजात पाई जा सकती है। यह शंका कि पिता द्वारा लड़की के नाम संपŸिा दे दिए जाने के बाद भी क्या ये संभावना नहीं होगी कि फिर भी लड़के वाले दहेज मांगे। इसका यह जवाब हो सकता है कि जो भी लड़की के हिस्से में आता था, सब दे दिया, अब कोई और हिस्सा क्यों देगा। फिर शायद ही किसी ने सुना हो कि लड़की वाले ने लड़का से दहेज मांगा हो, इसकी यही वजह है कि लड़का का पैतृक संपŸिा में हिस्सा जो भी है उसे आधिकारिक रूप से उसके नाम है, नाम होना है, इसीलिए उनसे दहेज मांगी नहीं जाती, लड़की को भी आधिकारिक रूप से हिस्सा देने से लड़की भी पति व ससुराल वाले के कहने पर दहेज नहीं मांगेगी। अभी के परिस्थिति में लड़की को संपŸिा के बजाय दहेज दिए जाने से लड़का व ससुराल वालों को दहेजनुमा लालचीपना पिशाच होंठों पर लग जाता है जो कि जब-तब उभरकर सामने आता-रहता है। शादी के बाद शुरुआत में दहेज की मांग पर दहेज कम-ज्यादा मात्रा में प्रदान की जाती रहती है और यह पिशाच आगे ही बढ़ता जाता है, समय-समय पर इसकी पूर्ति नहीं किए जाने से यह या तो लड़की का जीना मुश्किल कर देता है या फिर कभी-कभी निगल भी लेता है।  संपŸिा में हिस्सा दिए जाने से ये परेशानी बच सकती हैं, फिर आर्थिक सŸाा प्राप्त कर महिला हीन भावना से भी ग्रस्त होने से बच सकती है व आर्थिक बल पर वह निर्णायक व मजबूत भूमिका परिवार व समाज में निभा सकती है। अर्थात मायके में भी महिला का घर होने से ससुराल में विकट परिस्थिति का अनुभव करने पर या वहां से निकाले जाने पर आत्महत्या करने या मरने-मारने का रास्ता चुनने के बजाय उसे अपना पहला घर मायका वापस आने का रास्ता भी रहेगा व उसके नाम से घर रहेगा तो उसका अधिकार भी रहेगा।
अभी के परिस्थिति में शादी के बाद लड़कियों को यही बताया जाता है कि अब मायका में तेरा कुछ भी नहीं, तू जो भी करना व जैसे भी रहना, ससुराल में रहना। मायका उसके पास विकल्प नहीं होता और ससुराल में भी पति के हिसाब से चलना होता है चाहे वह सही वा गलत हो उसका पालन करना उसकी जिम्मेदारी बनाम मजबूरी होती है। ऐसा ही ससुराल की संपŸिा पर भी लागू होता है, यहां भी पति के साथ रहते हुए भी उसका पति के संपŸिा में जो कि शादी के बाद भी अर्जित हो, हिस्सा नहीं होता। यद्यपि मनमोहन सिंह सरकार की कैबिनेट ने हिंदू विवाह कानून में संपŸिा संबंधी इस संशोधन को मंजूरी दी है कि तलाक के समय शादी के बाद अर्जित पति के नाम की संपŸिा में से कुछ हिस्सा पत्नी को मिलेगा। हिस्सा कितना प्रतिशत मिलेगा, ये तय नहीं है, इसे न्यायालय के ऊपर छोड़ दिया गया है। यह विधेयक विभिन्न गठबंधनों वाली कमजोर सरकार के तरह ही लचर दिखती है, व निर्णायक नहीं लगती है, इसकी एक वजह यह है कि संपŸिा में कितना हिस्सा मिलना चाहिए, यह तय नहीं है, जिससे तलाक संबंधी कानूनी प्रक्रिया के दौरान संपŸिा में हिस्से को लेकर विवाद बना रह सकता है। दूसरी ये उलझन है कि अगर लड़का शादी के बाद अपने माता-पिता के नाम से संपŸिा अर्जित करता है तो महिला को उसमें से हिस्सा मिलेगा कैसे और क्या सास-ससुर आसानी से उसे अपने नाम की संपŸिा में से हिस्सा देंगे। तीसरी यह कि वैवाहिक जीवन की सफलता पति-पत्नी दोनों के मिलने से बनती है, इसलिए गोवा के तरह विवाह के बाद से पति-पत्नी द्वारा अर्जित तमाम संपŸिा में दोनों का बराबर हिस्सा होना चाहिए।  ऐसे कई प्रश्न है जो इस संशोधन विधेयक पर पुनर्विचार के लिए बल देता है।
क्या यह प्रश्न विचारणीय नहीं है कि क्यों हमारी विधायी व कानूनी व्यवस्था महिला के दोनों घर मायका व ससुराल दोनों ही जगह आर्थिक सŸाा की लिहाज से पंगु बनाकर रखता है, या रखना चाहता है। मायके की संपŸिा में हिस्सा नियत किए जाने के बावजूद शादी के बाद लड़की को पारिवारिक रूप से इस अधिकार से वंचित किया जाता है और कानून में इस अधिकार को व्यावहारिक रूप से लागू करने की इच्छा नहीं है, जबकि दहेज को पंजीवद्ध की योजना है, अभिभावक ने लड़की को हिस्सा दिया कि नहीं, इस संबंध को लेकर कोई योजना नहीं है। बालविवाह अपराध है, समझते हुए भी जब अभिभावक द्वारा लड़की का बालविवाह कराया जाता है, तो उचित ये था कि इसकी सजा अभिभावक को दिया जाना चाहिए जबकि ये सजा नबालिग लड़की जो कि उस समय निर्णायक स्थिति में नहीं होती, उसे विभिन्न सरकारी नौकरियों की सुविधाओं से वंचित कराकर लड़की को आजीवन झेलने के लिए मजबूर की जाती है। इसी तरह ससुराल के वैवाहिक जीवन में भी महिला हीन, पंगु व गुलाम बनकर जीए, इसीलिए कानूनन उसे ससुराल की संपŸिा से भी वंचित रखने का प्रयास किया जाता है।
अतः जब तक महिला को भी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक व कानूनी समर्थन हर वातावरण में अभिव्यक्ति व आजादी के साथ जीने के लिए नहीं मिलेगा, वह पुरुष की गुलाम बनी रहेगी। क्योंकि यह बातावरण ऐसा है जहां महिला को जीने के लिए पुरुषवादी सŸाा स्वीकार करके रहना व हरसंभव उसके हिसाब से जीने के तौर-तरीका सीखना जरूरी है, इसीलिए हो सकता है, वह अपनी पैदा हुई बेटियों व बहुओं को भी पुरुष गुलामी के तौर-तरीके सीखाए।
यद्यपि कई परिवारों में महिलाओं ने बेटा-बेटी में विभेद करना छोड़ दिया है व लड़के के तरह ही लड़की को भी उचित शिक्षण-प्रशिक्षण प्रदान कर रही है। जहां ये संभव नहीं है, वहां भी कई महिलाएं आगे बढ़कर लड़कियों की मदद करना चाहती है। इस संदर्भ में मेरी एक परिचित का कहना था कि उसके पति ने बेटा को तो निजी स्कूल में डाल दिया है और उसके टयूशन के लिए भी पैसा देते हैं लेकिन मेरी बेटी  सरकारी स्कूल में पढ़ती है और उसके टयूशन के लिए भी पैसे नहीं देते। मैं घर के खर्चों से पैसे बचाकर बेटी को टयूशन भेजती हूं ताकि उसे पढ़ाई में दिक्कत नहीं हो। ऐसी कई जागरूक महिलाएं अपनी बेटी, बहन या फिर सहेलियों की सार्वजनिक रूप से या छुप कर मदद करती है।
यद्यपि बाकी महिलाओं का भी पुरुषवादी व्यवहार इस बात का प्रतीक नहीं है कि नारी-नारी की दुश्मन होती है बल्कि इस बात का प्रतीक है कि पुरुषवादी सŸाा के अनुसार चलते-चलते वह पुरुष का मोहरा बन चुकी है, जिनका उद्देश्य पुरुषवादी सŸाा को फैलाना है। ऐसा करने के लिए या तो महिलाएं मजबूर है या फिर पुरुषवादी सŸाा के जुल्म का विरोध करने पर उसे इतनी व ऐसी निर्मम सजा मिल चुकी है कि अब उसमें सही बातों का भी समर्थन करने की हिम्मत नहीं है।
जब तक महिलाओं को जीने के लिए हर स्तर पर सकारात्मक वातावरण नहीं मिलेगा और उसे ये एहसास न होगा कि उसके सर पर भी बड़ों व अपनों का हाथ है, खाली हाथ नहीं बल्कि साधिकार है तब तक शायद महिलाओं को गुलाम बनाने की प्रथा चलती रहेगी और वह पुरुषवादी सŸाा की मोहरा बनती रहेगी, बात यही पर खतम नहीं है, शोषक पुरुषवादी समाज है जबकि दोष महिलाओं पर डाला जाए, सजा ये भी तो कम नहीं।